45 -- ==== ये दुख भी कितने-कितने विभिन्न वस्त्राभूषण पहनकर आदमी के सामने आ खड़ा होता है, अचानक ही|आदमी गूंगा-बाहर बनकर देखता रह जाता है कि भाई कहाँ से आए थे, कहाँ ठिठके ?कहाँ मुड़े?और बाद में देखा तो खड़े थे शून्य पर मुँह फाड़े|न डगर समझ में आती है, न ही लक्ष्य और इंसान घुटता रह जाता है अपने ही भीतर ! आना को क्या मालूम था कि बासु दीदी चली जाएंगी |वे बोल नहीं रही थीं लेकिन वैसे पूरी तरह स्वस्थ दिखाई दे रहीं थीं | सबकी तरह उनका समय भी तय था, वो भी