दोनों भाइयों के बीच झगड़ा हो चुका था। ऐसा झगड़ाजिसमें शब्द नहीं, अहंकार जीत गया था। नियम के अनुसार अब श्रेया को करण के साथ रहना था। पर यह वही करण नहीं था जो कभी बिना कहे उसके दर्द को समझ जाता था।रात थी। कमरा शांत था, पर हवा भारी। श्रेया बिस्तर के एक कोने में चुपचाप बैठी थी। आँखें नीचे, कंधे सिमटे हुए। करण कमरे में टहल रहा था।करण (कठोर स्वर में) बोला - अब तुम मेरे साथ हो, तो ऐसे डर-डर कर क्यों बैठी हो?श्रेया चौंक गई।श्रेया (धीरे से) बोली - मैं डर नहीं रही…बस…थोड़ी असहज हूँ।करण रुक गया।करण (तेज़