अमृत वाणी - संत वाणी - 32

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भारत के महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के एक और परम सिद्ध, निश्छल और विट्ठल भगवान के अनन्य भक्त संत गोरा कुम्हार जी (संत गोरोबा) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और मर्मस्पर्शी अमृत वाणी यहाँ दी गई है। यह वाणी किसी भी मनुष्य की योग्यता को केवल उसके बाहरी दावों से न परखकर, जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपे हुए उसके आचरण और चरित्र से पहचानना सिखाती है।संत गोरा कुम्हार जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के खोखलेपन और पाखंड को छोड़कर, सत्य की कसौटी पर कसकर जीवन को प्रामाणिक बनाने का मार्ग दिखाती है।“मुंग्यांनी खाल्ला डोंगर, नाथांनी केला अंगीकार।कोण