बिसात का आखिरी मोहरा - 4

(217)
  • 2.6k
  • 951

पुस्तकालय के शीशों पर रात भर से हो रही मौत की दस्तक अब थमती हुई महसूस हो रही थी। बाहर बादलों का गरजना बंद हो चुका था और रुद्रपुर की पहाड़ियों के पीछे से भोर की पहली धुंधली रोशनी फूटने लगी थी। काली, खौफनाक रात का अंत हो रहा था और धीरे-धीरे सुबह की रोशनी विक्टोरिया पुस्तकालय के मुख्य हॉल में दाखिल हो रही थी।​"सुबह हो गई..." तारा ने अपनी सूजी हुई आँखों से खिड़की की तरफ देखते हुए राहत की सांस ली। उसकी आवाज में रात भर के खौफ के बाद जिंदगी की एक उम्मीद तैर रही थी।​शर्मा जी