मैं हूँ - लेकिन कर्ता नहीं

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  0 — कर्ता का अंत, होना शेष0 केवल शांति नहीं है।0 केवल विचारों का रुक जाना नहीं है।0 केवल ध्यान में बैठ जाना नहीं है।0 का मूल अर्थ है—कर्ताभाव का गिर जाना।मैं हूँ।बस हूँ।बाकी सब हो रहा है।शरीर चल रहा है।मन सोच रहा है।भाव उठ रहे हैं।क्रोध आता है।प्रेम आता है।सुख आता है।दुःख आता है।परिस्थितियाँ आती हैं और चली जाती हैं।कर्म होते हैं।लेकिन भीतर एक पकड़ समाप्त हो जाती है—“मैं कर रहा हूँ।”यही 0 है।मैं हूँ — लेकिन कर्ता नहींयहाँ “मैं नहीं हूँ” नहीं कहा जा रहा।बल्कि—“मैं हूँ, पर मैं कर्ता नहीं हूँ।”यह बहुत सूक्ष्म अंतर है।यदि “मैं नहीं हूँ”