रामपुर नाम का एक छोटा सा गाँव था। उसी गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-फूटी झोपड़ी में सावित्री नाम की एक बुढ़िया रहती थी। उसकी उम्र लगभग सत्तर साल थी। उसके पति का देहांत दस साल पहले ही हो गया था। उसका एक ही सहारा था, उसका इकलौता बेटा प्रकाश, जो शहर में एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था।सावित्री की झोपड़ी में एक चीज सबसे खास थी, एक बहुत पुराना, जंग लगा हुआ लोहे का संदूक। वह संदूक हमेशा ताले में बंद रहता था और उसकी चाबी सावित्री अपने आँचल में बाँध कर रखती थी। गाँव भर में