या अपने ही घर में बचपन से यौवन की दहलीज में कदम रखना कसूर था मेरा ??भूमि की आंखों में आंसुओं की धारा और जुबान से शब्दों की धारा बह निकली थी।शायद बरसों का गुबार था जो आज फूट पड़ा था।मैं तो नादां थी पापा पर आप तो बड़े थे?मैं असहनीय पीड़ा को सहती रही और आप उस दुष्ट को सजा भी ना दे पाए क्यों??इसलिए कि वो तुम्हारा भाई था .!!पर मैं भी तो आपकी बेटी थी ना पापा ..!छोटी-सी मासुम सी..तुम उस दुराचारी को सजा भी नहीं दिला पाए क्यूंकि रिश्तो की बेड़ियों से तुम्हारे हाथ पैर बंध