शब्द और सत्य - भाग 16

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 46. मोह का पिंजराजिसे तुम प्रेम कहते हो, वो केवल एक बीमारी है,पकड़ रखा है तुमने जिसे, वो दुख की ही तैयारी है।सामने वाला बदल जाएगा, इस झूठी आस में जीते हो,रोज़ ज़हर वो देता है, तुम घूंट-घूंट कर पीते हो!तुम्हारी आत्मा सिकुड़ गई, पर तुम कहते हो 'मेरा है',ध्यान से देखो आखों को, वहाँ ज्ञान नहीं, बस अंधेरा है।जो तुम्हें तुम्हारी ही नज़रों में छोटा कर डाले,क्यों पाल रखे हैं तुमने, ऐसे रिश्ते दुख देने वाले?अकेले होने से डरते हो, इसलिए नरक को सहते हो,ग़ुलामी की ज़ंजीरों को, तुम 'गहरी चाहत' कहते हो!सच्चा रिश्ता वो जो तुम्हें, खुद से