धुंध के पीछे - 3

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भाग 3: बिछाया गया जालहवेली के बाहर शाम ढल रही थी और आसमान में काले बादल घिर आए थे। ड्राइंग रूम के अंदर का सन्नाटा बाहर के मौसम से भी ज़्यादा भारी था। मुस्कान के हाथ में इत्र की वो शीशी अभी भी थी, जिसकी महक अब पूरे कमरे में फैल चुकी थी। दानिश सोफे पर पैर फैलाए बैठा था, मानो उसे किसी बात की कोई फिक्र ही न हो। उसका यह सुकून मुस्कान को अंदर ही अंदर डरा रहा था।तभी अचानक हवेली के अहाते में पुलिस की गाड़ियों के ब्रेक लगने की आवाज़ गूँजी। 'चररर...' और फिर कई कदमों