किताबों के बीचby PATEL RJबनारस,1952, गंगा के किनारे वाली पुरानी हवेली जैसी लाइब्रेरी। छत तक ऊँची अलमारियाँ, लकड़ी की खुशबू, और पंखे की धीमी चिर-चिर।रवि वहीं लाइब्रेरी में हिसाब-किताब और किताबें संभालता था। एम.ए. कर रहा था, पर घर की हालत की वजह से नौकरी करनी पड़ती थी। सादा, सफेद कुर्ता और आँखों में किताबों जैसी गहराई।मीरा उसी शहर के सबसे बड़े ज़मींदार की बेटी थी। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ी पर उसे हिंदी साहित्य से प्यार था। हर मंगलवार और शुक्रवार वो पढ़ने आती। हमेशा एक ही कोना, हमेशा एक ही किताब... और बीच-बीच में रवि से एक-दो सवाल।पहले सिर्फ