संयोगिता की हंसी कमरे में गूंज उठी। यह कोई सामान्य हंसी नहीं थी। यह एक ऐसी हंसी थी जिसमें पागलपन, दर्द और खौफ का मिश्रण था। इसे सुनकर सबकी रूह कांप गई। ऐसा लग रहा था जैसे वह पूरी तरह से अपनी मानसिक संतुलन खो चुकी है।फिर वह उठी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, लेकिन इरादे मजबूत थे। वह अपनी ही हवेली की दीवार की तरफ बढ़ी, जहाँ महक का खून छिड़का हुआ था। उसने अपने खून से सने हाथ से दीवार पर एक नया मुहावरा लिखा -पाप का अंत विनाश है।लिखने के बाद, वह वापस महक की लाश के पास