शहर का वह सुनसान, वीरान इलाका जहाँ कभी संयोगिता की जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हुई थी, आज उसका अंत होने वाला था। बारिश की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी, जो खून की गंध को धो नहीं पा रही थी, बस उसे और ज्यादा भयानक बना रही थी।संयोगिता उस पुरानी गोदाम की इमारत के अंदर दाखिल हुई। उसके कदम भारी थे, लेकिन उसके हाथ में पकड़ी हुई पिस्तौल एकदम स्थिर थी। सामने, एक टूटी कुर्सी पर बैठा वह 'शिकारी' था—वह आदमी जिसने संयोगिता की मासूमियत छीनी थी, जिसने उसे एक मशीन बना दिया था। वह अब भी वहीं था,