मातृभारती का अधूरा पन्ना

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रात के बारह बज चुके थे, पर मयूर के कमरे की खिड़की से आती ठंडी हवा और मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी अब भी जाग रही थी। मयूर मातृभारती ऐप पर नियमित रूप से लिखता था। वह रोज़मर्रा की भागदौड़ और दफ़्तरी काग़ज़ातों की सूखी दुनिया से थककर जब भी खाली होता, अपने जज़्बातों को कहानियों में ढाल देता। मातृभारती पर उसकी रचनाएँ पढ़ी तो जाती थीं, लेकिन वह किसी लाइक्स या तालियों का भूखा नहीं था। उसके लिए लिखना खुद से मिलने का एक ज़रिया था।उसी ऐप पर लेखकों की लंबी सूची में एक प्रोफ़ाइल थी—अनामिका।अनामिका की कलम में