Saarghaa - 3

Episode 3 - जैसे बरसों पुराने दोस्त हों दरवाजे पर जो दस्तक थी, वो अब नहीं थी। बाहर बारिश अब तेज नहीं, बस टप-टप गिर रही थी। जैसे आसमान भी थक गया हो अंदर, मिट्टी के घर में चूल्हे की आंच धीमी हो गई थी। राख में अभी भी हल्की सी गरमाहट थी, लाल-लाल अंगारे चमक रहे थे।अभ्यंकर और सारघा, दोनों जमीन पर ही बैठ गए थे। बीच में दो कुल्हड़ रखे थे, एक आधा खाली, एक पूरा भरा। बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ बारिश की आवाज और चूल्हे की चिट-चिट।फिर सारघा ने ही चुप्पी तोड़ी।"आप पुणे में