गरीब के बहते आंसु - 1

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उस समय की बात है, जब झारखंड बिहार से अलग नहीं हुआ था। गांवों में गरीबी और बेरोजगारी का ऐसा आलम था कि पेट की आग बुझाने के लिए लोग अपनी मिट्टी छोड़कर सैकड़ों मील दूर परदेस जाने को मजबूर थे।बोकारो स्टील सिटी से सप्ताह में तीन दिन एलएपी एक्सप्रेस तमिलनाडु की ओर जाती थी। झारखंड के अलग-अलग जिलों से मजदूरों की टोलियां उसी ट्रेन में सवार होतीं। आठ-दस महीने परदेस में मजदूरी करते और आषाढ़ लगते ही गांव लौट आते—हल-बैल संभालने, खेतों में धान रोपने और अपनी मिट्टी की गंध में फिर से सांस लेने।हरखू कोइरी पढ़ा-लिखा नहीं था।