एहसास

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  पहले तो गुजाराभत्ता के नाम पर अड़ी रही सुहानी। मनोज अपने सामर्थ्य को देखते हुए इतनी बड़ी रकम के लिए हामी भरी थी। सुहानी और बेटी काव्या के भविष्य को लेकर चिंतीत थी और वो इस बात को लेकर चिंतीत थी कि इतने रूपयों में दोनों का गुजारा भली-भांति हो पाएगा कि नहीं। कैसे हो पाएगा इतने कम पैसों में सारी आवश्यकताओं की पुर्ति। सुहानी यह सोचते-सोचते सोच की दुनिया में चली जाती है। हर रोज की तरह दरवाजा खोलने के इंतजार में दरवाजा पर खड़ी सुहानी इस पात पर ध्यान नहीं दे सकी कि दरवाजा तो सटा हुआ