"बेटा, जब तक यह साइकिल चल रही है, तब तक तेरा बाप खड़ा है।" पिता के इन शब्दों की असली कीमत मुझे उस दिन समझ आई, जब उस पुरानी साइकिल का पेडल हमेशा के लिए रुक गया और सिर से वो बरगद की ठंडी छाँव अचानक उठ गई...गाँव के छोटे से मकान में आज एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के कोने में जंग लगी वो पुरानी साइकिल चुपचाप खड़ी थी, जिससे कभी मेरे सपनों की उड़ान शुरू हुई थी।बचपन के वो दिन याद आते हैं तो आँखें नम हो जाती हैं। जब भी मैं स्कूल के लिए लेट