"बेटा, पुरानी अलमारी में एक डिब्बा रखा है... मेरे जाने के बाद ही खोलना!"[कहानी]रमेश शहर की एक बहुत बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर पहुँच चुका था। उसकी ज़िंदगी में अब सिर्फ़ काम, मीटिंग्स और पैसा ही सब कुछ बनकर रह गए थे। शहर की भाग-दौड़ और चकाचौंध में वह अपने गाँव में रहने वाले बूढ़े माता-पिता को लगभग भूल ही चुका था। उसकी माँ जब भी फोन करती, तो बस एक ही सवाल पूछती— "बेटा, घर कब आ रहा है?" और रमेश हर बार 'काम का दबाव' बताकर बात टाल देता।रमेश को लगता था कि हर महीने बैंक में