दिल्ली की तेज, बर्फीली बारिश किसी को भी भिगो सकती थी, लेकिन आकाश के लिए यह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि उसकी बेबसी के थपेड़े थे।सड़क किनारे एक टूटी हुई टीन की छत के नीचे खड़े आकाश ने कांपते हाथों से अपना पुराना लेदर का बटुआ खोला। अंदर केवल मुड़ी-तुड़ी दो-चार बस की टिकटें और दस रुपये का एक भीगा हुआ नोट बचा था।"दस रुपये... और आज पूरे दिन का खाना बाकी है," आकाश बुदबुदाया। उसके फटे जूतों में से गंदा पानी रिसकर मोज़ों को चुभ रहा था।तभी उसकी जेब में पड़ा पुराना फोन जोर-जोर से थरथराया। स्क्रीन पर नाम चमक