आख़िरी दस्तक

आख़िरी दस्तकएक ऐसा दरवाज़ा… जिसे रात के बाद कभी नहीं खोलना था।️ लेखककान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'--- भूमिकारात के सन्नाटे में जब पूरा गाँव सो जाता है, तब कभी-कभी कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सुनकर इंसान अपने ही घर में खुद को अजनबी महसूस करने लगता है।दरवाज़े पर दस्तक…घड़ी की टिक-टिक…बाहर किसी के चलने की आहट…और फिर अचानक किसी की धीमी आवाज़—“दरवाज़ा खोलो…”हम अक्सर कहते हैं कि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।लेकिन अगर एक रात…आपके बंद दरवाज़े के बाहर कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा हो जाए, जिसकी मौत कई साल पहले हो चुकी हो?और अगर वह आपका नाम लेकर पुकारे?तो