बांसुरी की धुन — भाग : ०७सत्संग अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका था।सभा में बैठे लोगों के चेहरों पर अब एक अलग ही शांति दिखाई दे रही थी। कुछ लोग वक्ता की कही बातों को मन ही मन दोहरा रहे थे, तो कहीं धीमी आवाज में उन बातों पर चर्चा चल रही थी। कोई अपने परिचितों से मिल रहा था, तो कोई चुपचाप बैठा जैसे भीतर उठे प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था।कीर्तन की अंतिम धुन वातावरण में जैसे ठहर-सी गई थी।माइक से विदाई के शब्द सुनाई दिए—“आप सभी का मंगल हो। जो सुना है, उसे केवल सुनकर न