मेरी मंजिललेखक: विजय शर्मा एरीगाँव की धूल भरी सड़क पर सूरज ढल रहा था। आसमान में लाल-नारंगी रंग फैल गए थे। पंद्रह साल का रवि अपने स्कूल का बैग कंधे पर लटकाए, सिर झुकाए चल रहा था। उसके पैरों में घुटनों तक की खाकी पैंट और फटी चप्पलें थीं। बैग में किताबें तो थीं, लेकिन दिल में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—“मेरी मंजिल क्या है?”रवि के पिता रामप्रसाद एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे। माँ सीता घर का काम संभालतीं और कभी-कभी पड़ोस के घरों में बर्तन माँजकर कुछ पैसे कमा लेतीं। तीन भाई-बहनों में रवि सबसे