कभी धूप, कभी छाँवलेखक: विजय शर्मा एरीगाँव के किनारे बसे छोटे-से घर में सुबह की पहली किरणें जब खिड़की से घुसतीं, तो रमेश को लगता था जैसे जीवन खुद आकर मुस्कुरा रहा हो। नीम के पेड़ की घनी छाँव में बैठी माँ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकतीं और पिता खेतों की ओर निकल जाते। रमेश उस समय बारह साल का था। जीवन उसके लिए सिर्फ खेल, दोस्तों की हँसी और माँ के हाथ का गुड़ था। धूप और छाँव दोनों ही प्यारे लगते थे—धूप में खेत की मिट्टी गरम होती और छाँव में नीम की ठंडक शरीर में उतर जाती।लेकिन जीवन