नज़र

(22)
  • 642
  • 186

अध्याय 1: धुंधलाता आसमानशहर के पश्चिमी छोर पर बसी 'शांति कॉलोनी' की तंग गलियों में सुबह का सूरज अक्सर देर से पहुँचता था। इन संकरी गलियों में हवा कम और इंसानी सांसों की घुटन ज़्यादा तैरती थी। यहीं एक पुराने, जर्जर से मकान के एक छोटे से कमरे में रहती थी—नव्या।नव्या की उम्र महज़ बाईस साल थी, लेकिन उसकी आँखें उम्र से बहुत पहले ही ज़िंदगी की गहराइयों और उसके अंतहीन संघर्षों को देख चुकी थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सूनापन रहता था, मानो कोई अनकहा डर हमेशा उसकी पलकों के पीछे छिपा बैठा हो। उसके लंबे, काले