बहन के समझाने के बाद राजू ने कांपते हाथों से हितेश का नंबर मिलाया।फोन की घंटी बजी और सामने से हितेश ने फोन उठा लिया। शुरुआत के कुछ सेकंड दोनों तरफ सिर्फ गहरी खामोशी छाई रही। राजू की हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वो कुछ बोल पाए, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।तभी हितेश ने ही खामोशी तोड़ते हुए कहा, "अरे! कैसा है भाई? चुप क्यों है? फोन क्या मेरी साँसें सुनने के लिए किया है? या अब फोन पे तेरी तेज़ चलती साँसें सुनूँ मैं?!"हितेश का यह अंदाज़ सुनकर राजू के चेहरे पर