वंश और विरासतएक सामाजिक कहानीशाम धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रही थी। दिनभर की भागदौड़ के बाद बाजार की चहल-पहल कम होने लगी थी। सतीश मंडल, जिन्हें मोहल्ले के लोग प्यार से सती दा कहते थे, हाथ में सब्जियों का झोला लिए घर लौट रहे थे। उम्र ने उनके कंधों को झुका दिया था, बाल सफेद हो चले थे और आँखों की रोशनी भी पहले जैसी नहीं रही थी। फिर भी जीवन की गाड़ी किसी तरह खींचे जा रहे थे।घर पहुँचकर उन्होंने चौखट से ही आवाज लगाई, “सरला! अरे, अभी तक बाती क्यों नहीं जलाई?”अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। उन्होंने