हयग्रीव उपनिषद

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हयग्रीव उपनिषद--हयग्रीव उपनिषद वैष्णव परम्परा का एक लघु उपनिषद है, जिसमें भगवान हयग्रीव को परम ज्ञान, विद्या और ब्रह्मविद्या के स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है।हयग्रीवोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध वैष्णव उपनिषद् है और उपलब्ध पाठ में इसे दो मुख्य भागों/उपनिषदों में प्रस्तुत किया गया है।हयग्रीवोपनिषद् — प्रथम भागमंगलाचरणस्वज्ञोऽपि यत्प्रसादेन ज्ञानं तत्फलमाप्नुयात्।सोऽयं हयास्यो भगवान् हृदि मे भातु सर्वदा॥अर्थ:जिन भगवान् हयग्रीव की कृपा से स्वयं ज्ञानी पुरुष भी अपने ज्ञान का परम फल प्राप्त करता है, वे अश्वमुख भगवान् हयग्रीव सदा मेरे हृदय में प्रकाशित हों।शान्तिपाठॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः।व्यशेम देवहितं यदायुः॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः।स्वस्ति