वो बारिश और हम तुम

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रास्ते से जा रहा था कि अचानक ही बारिश शुरू हो गई। छाता तो लिया नहीं था, क्योंकि अभी मौसम पूरा अपने रंग में नहीं आया था।लेकिन इस बार बूँदें ज़ोरों पर थीं, जैसे किसी से बहुत गुस्सा हो और उसी गुस्से में टूट पड़ी हों।समझदारी इसी में थी कि कहीं किसी शेड के नीचे सहारा लिया जाए, जब तक बारिश का गुस्सा शांत होकर प्यार से रिमझिम बरसने न लगे।सामने एक चाय की टपरी थी, जिसे ताड़पत्री और प्लास्टिक से चारों तरफ़ से ढका गया था।वाह! बारिश हो और गरमा-गरम चाय हो... मज़ा आ जाए!मन वहीं मुड़ गया। झट