मोहब्बत और समाज - अध्याय 2

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अध्याय 5: उम्मीदों का सफर और एक अनकहा डरगाँव की वो धूल भरी पगडंडी आज बहुत लंबी लग रही थी। बस स्टैंड की तरफ बढ़ते मेरे हर कदम के साथ पीछे छूट रहा था मेरा बचपन, मेरी गली और वो चेहरा जिसे मैं तीसरी क्लास से देखता आ रहा था।मेरे हाथ अभी भी थोड़े काँप रहे थे। कुछ ही देर पहले मैंने उसे वो अंगूठी थमाई थी। जब उसने पूछा था, मैं क्या करूँ इसका? तो मेरे पास बहुत लंबी बातें करने का वक्त नहीं था। मैंने बस इतना ही कहा, इसे पहन लेना, और भारी मन से मुड़ गया।जब