मंजिले - भाग 56

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                       एक कहानी -----                  ज़िन्दगी मे कोई इतना कोई कयो भूल जाता है, सोचता हुँ, कि किसी कि भी आजादी पूर्वक जिंदगी है... सतपाल को आज समझ आया , " हकूमत कयो ? किसी पर, मित्रो से कोई मिल भी नहीं सकता,फर्श खराब होता है कयो? हर किसी की ज़िन्दगी है " सतपाल सोच रहा था, गंगा की शात लहरों मे... डुबकी  लगा कर "हर हर गंगे कहता " माँ की हस्तीया वहा कर सोच रहा था, कि यही ज़िन्दगी है बस