नानी की अंतिम क्रिया होने तक माँ और मैं वहीं रहे। इन दिनों माँ बिल्कुल चुप-चुप सी हो गई थीं। न उनकी आँखों में पहले जैसी बेचैनी थी और न ही चेहरे पर कोई भाव। वह बस खामोशी से बैठी रहतीं, जैसे उनके भीतर कुछ ऐसा टूट गया हो, जिसकी आवाज़ अब बाहर तक नहीं पहुँच सकती थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उनकी इस खामोशी में क्या छिपा था। क्या यह नानी के आखिरी पलों में उनके पास न पहुँच पाने का पछतावा था? या फिर सारी ज़िंदगी अपनी माँ से दूर रहकर जीने का दर्द, जो