हवेली चारों तरफ से टूटी-फूटी, बेलों और धूल से ढकी हुई है।बिजली चमकती है — और दीवारों पर पुराने चित्र झिलमिलाते हैं।हवा में अजीब सी ठंडक है। करन धीरे-धीरे अंदर कदम रखता है।उसकी चाल में कुछ रहस्य है — जैसे वो किसी चीज़ की तलाश में आया हो।)(दरवाज़ा चरमराता है।।हवेली के अंदर सन्नाटा है।पीछे-पीछे सिमरन धीरे-धीरे आती है, उसके कदम काँप रहे हैं।वो परदे के पीछे छिपकर करन को देखती है।)सिमरन (धीरे से खुद से) बोली - ये यहाँ क्या करने आए हैं?… इतनी रात को…(अचानक — करन के कदम रुकते हैं।।वो जैसे कुछ महसूस करता है। सिमरन साँस रोक लेती