अध्याय:04बेसुरा बांस और खामोश रियाज़ बनारस की तंग गलियों में जहाँ हर सुबह शहनाई और तबले की गूंज सेहोती थी, वहाँ राघव की बांसुरी का स्वर किसी को नहीं भाता था। राघवके पिता शहर के जाने-माने संगीतकार थे, लेकिन राघव की बांसुरी हमेशाएक 'बेसुरा' मोड़ ले लेती थी। वार्षिक संगीत उत्सव में जब राघव ने मंचपर कदम रखा, तो पहले ही मिनट में उसकी बांसुरी से एक ऐसी तीखीआवाज निकली कि पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा। राघव का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह मंच छोड़कर भागा और गंगा केकिनारे जाकर बैठ गया। उसके हाथ में वही बांसुरी थी, जिसे वह अब तोड़देना चाहता था। उसे लगा कि संगीत उसके बस की बात नहीं है। तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज आई, "बांसुरी को दोष मत दो राघव, अपनीउंगलियों की उस हरकत को पहचानो जो हर बार चौथे छेद पर आकरकांप जाती है।" वह उसके उस्ताद थे।उन्होंने राघव को पास बिठाया और कहा, "तुम घंटों अभ्यास करते हो, लेकिन तुम वही बजाते हो जो तुम्हें पहले से आता है। उत्कृष्टता केवलअभ्यास से नहीं, बल्कि सुनियोजित अभ्यास (Deliberate Practice) सेआती है। अपनी उस एक कमजोरी को पकड़ो जो सुर बिगाड़ती है, औरसिर्फ उसी पर वार करो।"राघव को बात समझ आ गई। उसने तय किया कि वह अब घंटों तक पूरीराग नहीं बजाएगा, बल्कि केवल उस 'एक सुर' का अभ्यास करेगा जो उसेसबसे ज्यादा डराता था। अगले छह महीने राघव के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। उसने अपनेकमरे के शीशे पर एक कागज़ चिपका दिया जिस पर लिखा था—"आजका सुधार: कोमल निषाद पर नियंत्रण।" वह अब आँखें बंद करके नहीं, बल्कि अपनी हर उंगली की हरकत को गौर से देखकर अभ्यास करता।जब बाकी छात्र पूरी धुन बजाकर वाहवाही लूट रहे होते, राघव घंटों तककेवल एक ही स्वर को साधता रहता। उसने अपनी कमजोरी को दुश्मननहीं, बल्कि अपना गुरु मान लिया था। धीरे-धीरे, उसके उस कांपते हुए सुरमें एक स्थिरता आने लगी। वह सचेत होकर प्रयास कर रहा था, हर छोटीचूक को पकड़ रहा था और उसे ठीक कर रहा था। अगले साल फिर वही मंच था, वही भीड़ थी। जब राघव ने बांसुरी होठों सेलगाई, तो इस बार हॉल में हंसी नहीं, बल्कि एक रूहानी सन्नाटा छा गया। उसकी बांसुरी से निकलने वाला हर सुर इतना सधा हुआ और स्पष्ट थाजैसे कोई हीरा तराशा गया हो।संगीत खत्म हुआ, तो लोग अपनी सीटों से खड़े हो गए। उस्ताद की आँखोंमें आंसू थे। उन्होंने राघव को गले लगाकर बस एक बात कही, "आजतुमने साबित कर दिया कि एक साधारण कलाकार और एक उत्कृष्टकलाकार के बीच की दूरी केवल 'सचेत अभ्यास' से भरी जा सकती है।"सीख :कामयाबी रातों-रात नहीं मिलती, और न ही केवल आँख बंद करके मेहनतकरने से मिलती है। असल उत्कृष्टता तब आती है जब आप अपनीकमजोरियों को पहचानने की हिम्मत रखते हैं और उन्हें सुधारने के लिए हरदिन एक छोटा लेकिन सचेत कदम उठाते हैं। हर छोटा सुधार आपकोपूर्णता (Perfection) की ओर ले जाता है।उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए सचेत होकर प्रयास करें और अपनीक्षमताओं में धीरे-धीरे सुधार करें। यह याद रखें कि सुनियोजित अभ्यासही आपको असाधारण बनाता है। अध्याय:05दो किनारों का संगम पहाड़ों की गोद में बसे 'नीलगिरी' गांव में एक पुरानी रस्म थी। गांव के लोगमानते थे कि उत्तर की ओर बहने वाली 'शीतल धारा' का पानी शापित हैऔर उसे पीने वाला बीमार हो जाता है। सदियों से यह विचार पत्थर कीलकीर बन चुका था।एक दोपहर, गांव के चौराहे पर एक सस्पेंस ग अजनबी, जो शहर से आयाएक वैज्ञानिक लग रहा था, अपनी प्यास बुझाने के लिए सीधे उसी 'शीतलधारा' की ओर बढ़ रहा था।"रुको! मत पीना!" गांव के सबसे बुजुर्ग काका चिल्लाए। पूरा गांव वहांइकट्ठा हो गया। सन्नाटा ऐसा था कि हवा की सरसराहट भी सुनी जासकती थी।अजनबी रुका, मुस्कुराया और एक घूंट पानी पी लिया। गांव वालों कीसांसें अटक गईं। उन्हें लगा कि वह अभी गिर जाएगा। लेकिन कुछ नहींहुआ।अजनबी का नाम डॉ. ईशान था। उन्होंने गांव वालों को समझाया कि पानीसाफ है, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। काका ने कहा, "हमारेपूर्वजों ने कहा है, तो यह सच ही होगा। तुम बस भाग्यशाली थे।"डॉ. ईशान समझ गए कि गांव वालों का दिमाग केवल उसी जानकारी कोस्वीकार कर रहा है जो उनके पुराने विचारों (Pre-existing Beliefs) सेमेल खाती है। इसे विज्ञान में 'कन्फर्मेशन बायस' कहते हैं। लोग नई बातसीखने के बजाय अपनी ही पुरानी धारणाओं में अटके हुए थे।ईशान ने हार नहीं मानी। उन्होंने गांव के स्कूल के मास्टर जी से बात की। मास्टर जी भी पुराने ख्यालों के थे, लेकिन वे तर्क सुनने को तैयार थे।डॉ. ईशान ने एक सभा बुलाई। उन्होंने एक मेज पर दो पारदर्शी जार रखे। एक में 'शीतल धारा' का पानी था और दूसरे में गांव के मुख्य कुएं का।"आज हम पक्ष और विपक्ष, दोनों को देखेंगे," ईशान ने दृढ़ता से कहा।उन्होंने सूक्ष्मदर्शी (Microscope) निकाला और गांव वालों को दिखायाकि कुएं के पानी में गंदगी थी, जबकि बहती धारा का पानी पूरी तरह शुद्धथा। उन्होंने एक पुरानी किताब भी निकाली जो गांव के ही एक पुराने वैद्यने लिखी थी, जिसे सब भूल चुके थे। उस किताब में लिखा था कि एकसमय में धारा के ऊपर कुछ जहरीली घास उगी थी, जिसके कारण वहपानी तब खराब हुआ था।"आप लोग एक पुरानी घटना को 'सदा सत्य' मानकर बैठे हैं," ईशान नेसमझाया। "जब आप किसी मुद्दे का दूसरा पक्ष नहीं पढ़ते या समझते, तोआप सच्चाई से दूर हो जाते हैं।"मास्टर जी ने पहली बार अपनी सोच की दीवार को गिरते हुए महसूसकिया। उन्होंने सूक्ष्मदर्शी से देखा और दंग रह गए। उन्होंने स्वीकार किया, "हम केवल वही देख रहे थे जो हम देखना चाहते थे।"धीरे-धीरे गांव वालों की सोच बदलने लगी। उन्होंने अपने विचारों के हरपहलू को समझा। वह दिन नीलगिरी गांव के लिए केवल एक अजनबी केआने का दिन नहीं था, बल्कि अपनी मानसिक बेड़ियों को तोड़ने का दिनथा।सीख : हमारा दिमाग अक्सर एक तरफा सोच का आदी हो जाता है। सच्ची बुद्धिमत्ता इसमें नहीं है कि हम जो जानते हैं उसे सही साबित करें, बल्कि इसमें है कि हम अपने विचारों के विपरीत पक्ष को भी सुनें औरसमझें। जब आप पक्ष-विपक्ष दोनों को तौलते हैं, तभी आप वास्तव में कुछ'नया' सीख पाते हैं और सही निर्णय ले पाते हैं।अपने पुराने विचारों में अटकने के बजाय, किसी भी मुद्दे के हर पहलू औरदूसरे पक्ष को भी समझें। यह आपको नया सीखने और विकसित होने मेंमदद करेगा।