#प्राणाग्निहोत्रोपनिषद#

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प्राणाग्निहोत्रोपनिषद--इस उपनिषद का सम्बन्ध अथर्ववेद से है। यह लघु उपनिषद है। इसमें कुल 23  श्लोक हैं जो तीन खण्डों में विभक्त हैं।मूल संस्कृत पाठ--1-मंगलाचरण--शरीरयज्ञसंशुद्धचित्तसंजातबोधतः । मुनयो यत्पदं यान्ति तद्रामपदमाश्रये ॥ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥हिन्दी अर्थशरीररूपी यज्ञ के द्वारा चित्त को शुद्ध करके जिस परम ज्ञान और परम पद को मुनिजन प्राप्त करते हैं, मैं उस श्रीराम के परम पद का आश्रय ग्रहण करता हूँ।हे परमात्मन्! आप हम दोनों (गुरु और शिष्य) की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों मिलकर सामर्थ्यपूर्वक कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और फलदायी