नवंबर की हल्की ठंड... और मीठी-सी धूप में... आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही थी। तभी अंदर से फोन की आवाज़ आई... ? "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..." "कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..." कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी। ? "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।
MTNL की घंटी - 1
नवंबर की हल्की ठंड...और मीठी-सी धूप में...आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही अंदर से फोन की आवाज़ आई... "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन...""कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..."कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी। "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।"हेलो..."एक अनजानी मर्दानी आवाज़ थी।"रोंग नंबर!" – कह कर वो फोन रख कर मुड़ने ही वाली थी,तभी फिर से घंटी बजी... "ट्रिन ट्रिन..."इस बार, महक के 'हेलो' कहने से पहले ही सामने से आवाज़ आई..."फोन मत रखिएगा... आपको कैसे पता कि रोंग नंबर है?"महक थोड़ा चौंकी।"आपकी आवाज़ किसी से मैच ...Read More
MTNL की घंटी - 2
14 नवंबर की सुबह थी।घर में रौनक थी... चहल-पहल थी... और एक खास चमक — जैसे सच में लक्ष्मी इस घर में पधार चुकी हों।महक आज कुछ अलग ही लग रही थी —लाल रंग की चूड़ियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, लाल साड़ी और पैरों में पायल की रुनझुन।वो घर की छोटी बहू होते हुए भी आज पूरे घर पर राज कर रही थी — हर एक जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही थी।खुद कम कर रही थी, लेकिन सबको लगन से काम में लगाए हुए थी।सास मंदिर गई थीं,पापा-बेटी दोनों पटाखे और मिठाई लेने बाजार जा चुके थे,और ताई जी — ...Read More
MTNL की घंटी - 3
अगले कुछ दिनों तक महक ने खुद को रोज़मर्रा के कामों में उलझाए रखा।पर जितनी कोशिश करती, उतनी ही अनजानी आवाज़ की परछाईं और गहरी होती जाती।रात को, जब पूरा घर नींद में डूब जाता, महक चुपचाप ड्रॉइंग रूम में आकर टेलीफोन को निहारने लगती…मानो कोई खामोश साया उसे पुकार रहा हो।अब उसे उस “रॉन्ग नंबर” वाले इंसान से एक अजीब-सी हमदर्दी होने लगी थी।उसके मन में कई सवाल बार-बार सिर उठाते—कौन है वो?देवी प्रसाद कौन है?क्या सचमुच कोई मुसीबत में है… या ये सब मेरे मन का वहम है?या फिर… ये सब सिर्फ इत्तेफाक नहीं, कोई इशारा है?इन ...Read More
MTNL की घंटी - 4
प्लीज़… बस आप एक काम कर दीजिए… कान्हा के कान पर रिसीवर रख दीजिए… आप सुन रहे हैं ना?”महक चीख पड़ी थी। उसकी आवाज़ में उतावलापन भी था और ममता भी।देव कुछ पल चुप रहा… फिर गहरी साँस लेकर बोला—“ठीक है… रखता हूँ।”बहुत मुश्किल से उसने रिसीवर उठाया और काँपते हाथों से कान्हा के कान के पास ले गया।दूसरे हाथ से उसने कान्हा को अपने सीने से कसकर लगाया हुआ था… जैसे टूटते हुए पल को थाम रहा हो।महक ने बिना एक पल गँवाए गाना शुरू कर दिया—“यशोमती मैया से बोले नंदलाला…राधा क्यों गोरी… मैं क्यों काला…”उसकी आवाज़ फोन ...Read More
MTNL की घंटी - 5
उस रात के बाद…उस रात के बाद पहली बार देव को चैन की नींद आई।कान्हा भी बिना किसी दौरे गहरी नींद में सोया रहा।देव हर थोड़ी देर में उठकर उसे देखता—कभी उसके माथे पर हाथ फेरता,कभी सीने पर हाथ रखकर उसकी साँसें महसूस करता…और फिर खुद ही तसल्ली लेकर वापस लेट जाता।जैसे उसे डर हो—कहीं ये सुकून… बस एक सपना न हो।दूसरी तरफ… महक की रात जागते हुए बीती।देव की टूटी हुई आवाज़…उसकी सिसकियाँ…कान्हा की मासूमियत…सब उसके भीतर कहीं गहरे उतर गया था।फोन पर हुई वो बातचीत—अब सिर्फ एक घटना नहीं रही थी…वो उसकी आत्मा के किसी कोने में ...Read More
MTNL की घंटी - 6
1 जनवरी 2002…सर्दी की वह सुबह…जब पूरा शहर नए साल की उमंग और खुशियों में डूबा था।घर का फोन बज रहा था।रिश्तेदार, दोस्त, जान-पहचान वाले… सभी अपनी शुभकामनाएँ भेज रहे थे।लेकिन महक…हर बार जब फोन की घंटी बजती… उसकी धड़कनें तेज़ हो जातीं।उसे सिर्फ एक ही नाम की उम्मीद होती…"देव…"हर बार जब फोन उठाती… और दूसरी तरफ से किसी और की आवाज़ सुनती…तो उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी उतर आती।सच तो यह था…इस नए साल में उसे सिर्फ एक ही तोहफा चाहिए था—देव की आवाज़।पिछले कुछ हफ्तों से उसके दिल में एक अजीब-सी खाली जगह बन ...Read More
MTNL की घंटी - 7
शाम के चार बज चुके थे...महक मुँह-हाथ धोकर आँगन में बैठी थी...धीरे-धीरे ढलती धूप की सुनहरी किरणें आँगन के कोने में सिमटने लगी थीं...महक की उंगलियाँ बार-बार उन्हीं किरणों को छूने की कोशिश कर रही थीं...जैसे कोई मासूम सा सपना हथेलियों में समेट लेना चाहती हो...तभी बाहर सड़क पर एक सफेद मारुति कार आकर रुकी...महक ने दरवाजे की ओट से झाँककर देखा...एक भारी-भरकम आदमी... हाथ में फाइलें थामे...सीधा दरवाजे की घंटी पर उँगली रख दी...महक का दिल जोर से धड़कने लगा..."क्या बड़े बाबू आ गए?" उसने खुद से सवाल किया...और जल्दी से दौड़कर अंदर चली गई...दरवाजा उसकी सास ने ...Read More
MTNL की घंटी - 8
ताया जी आ गए कप टूटने की आवाज सुन कर.."महक , चिंटू कही लगी तो नहीं""नहीं ताया जी ..ठीक "महक ने धीरे से कहा"अच्छा मैं भी चलता हूं अब देर हो रही है बस आपसे मिलने का मन था फाइल्स कल ड्राइवर ले जाएगा .अपना ध्यान रखिए"कह कर देव मुड़ने लगा तो ताया जी ने उसे कस कर गले लगा लिया।उसने हल्की नजर महक पर डाली ..उसके उड़े रंग को देखा और बिना एक क्षण रुके चला गया।महक…अब भी दरवाज़े के पास…जैसे जमीन में गड़ी खड़ी थी…चेहरा एकदम सफेद…हाथ काँप रहे थे…और दिल… जैसे किसी तूफ़ान में फँस गया ...Read More
MTNL की घंटी - 9
दस दिन की बेचैनी, दुआओं, और देखभाल के बाद…आज देव जी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल रही थी।महक के में एक अजीब-सी राहत थी — जैसे कोई अपना ठीक हो गया हो।पिछले कई दिनों से वह हर दिन सूप, दलिया या खिचड़ी बनाकर अस्पताल भिजवा रही थी।हर बर्तन में वो सिर्फ स्वाद नहीं, अपना मन, अपनी परवाह भी परोस देती थी।उसे खुद भी नहीं पता था ये सब क्यों कर रही है… बस अच्छा लगता था।देव जी के लिए कुछ करना, जैसे उसकी आत्मा को तसल्ली देता। ----------------उस रात नींद ...Read More
MTNL की घंटी - 10
कभी-कभी इंसान इतना भावुक हो जाता है कि जो भावना शब्दों में नहीं ढलती, वो आँखों के रास्ते बाहर जाती है..."ताया जी... थोड़ा पानी पी लीजिए," महक ने शून्य में ताकते हुए बैठे ताया जी से कहा।ताया जी ने चुपचाप गिलास उठाया और एक ही सांस में पानी गटक गए... मानो गले में कोई टीस अटक गई हो, जिसे निकाले बिना साँसे आगे बढ़ ही न पाएँगी।"ताया जी... फिर क्या हुआ? क्या सोनिया से शादी हो गई थी?"महक को थोड़ा बहुत पता तो था — देव ने कभी-कभी कुछ बातें इशारों में कही थीं — लेकिन आज वो सब ...Read More
MTNL की घंटी - 11
महक चुपचाप सब सुन रही थी...तभी ताया जी की आवाज़ टूटी — भारी, थकी हुई, जैसे वर्षों का बोझ ज़ुबान पर आ गया हो..."महक बेटा... ज़िंदगी में एक बहुत बड़ी गलती कर दी मैंने... बहुत बड़ी...""नहीं ताया जी, आप कोई गलती नहीं कर सकते," महक ने जल्दी से कहा, जैसे किसी टूटते हुए विश्वास को थाम लेना चाहती हो।ताया जी की आँखें कहीं दूर अतीत में जा टिकीं।"एक दिन मैंने सोनिया को मिलने बुलाया... बस उसे समझाने के लिए... लेकिन उसे मेरी दखलअंदाज़ी पसंद नहीं आई। बात बढ़ी... वो मुझ पर हाथ उठाने ही वाली थी, कि चिंटू ने ...Read More
MTNL की घंटी - 12
जब आँख खुली… तो अस्पताल का सफेद कमरा था…ताई जी और सास दोनों उसके पास बैठे थे।चेहरे पर चिंता थी… और कुछ उम्मीद भी।और तभी डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा —"बधाई हो… महक… तुम माँ बनने वाली हो!",सास खुशी खुशी बोली..."मंदिर की चौखट पर बैठी थी ना तुम ..तो खुद भगवान आने वाले है हमारे घर...कृष्ण भगवान आने वाले है"महक की आँखों से आँसू बह निकले…पर इस बार वो आँसू सिर्फ दुःख के नहीं थे…ये प्रार्थना मे किये गये प्रश्नो का उतर् था...…उतर था......" कान्हा" ---------------मार्च का आखिरी हफ्ता था...सर्दियाँ विदा ले ...Read More
MTNL की घंटी - 13
दो मिनट बाद बहुत संयमीत लहजे मे बोले देव "आलोक ने मुझें तुम्हारा लिखा पत्र दिया था..तुम्हे फोन करने हिम्मत जुटा रहा था की कान्हा की तबियत ज्यादा बिगड़ गयी और मुझें छोड़ कर चला गया...अब मेरी जिंदगी जीने का कोई मकसद नही था..पर तुम्हारे पत्र पर लिखी बात ने कुछ होने नही दिया मुझें ..तुम्हारी वजह से मेरे और मेरे कान्हा के चेहरे पर मुस्कुराहट आयी थी...इसलिए तुम्हे फोन किये बिना नही जा सकता था अपने बेटे के पास.. अब तो कोई जीने की वजह भी नही बची...थोड़े काम निपटाने थे...निपटा रहा हू..उसके बाद बेटे के पास जाऊंगा...मेरा ...Read More
MTNL की घंटी - 14
11 साल बाद ....सुबह के सात बज चुके थे।महक ने धीरे से करवट ली और बिस्तर से उठकर जैसे खिड़की खोली, एक ठंडी हवा का झोंका उसके गालों को चूम गया।धूप की एक मासूम सी किरण उसके चेहरे पर आकर ठहर गई —मानो कह रही हो, "मैं तुझसे प्यार करती हूँ..."महक ने अपनी दोनों हथेलियों से चेहरे को हल्के-हल्के रगड़ा, पर जिद्दी धूप वहीं बनी रही...शायद उसे सच में महक से प्यार हो गया था...प्यार होता भी क्यों न?36 की उम्र में भी महक किसी गुड़िया सी लगती थी —मासूम, सुंदर और हर जिम्मेदारी को मुस्कान से संभालने वाली।11 ...Read More
MTNL की घंटी - 15
आज दीवाली की रात थी…ना तो रंग-बिरंगी चूड़ियाँ थीं,ना साज-श्रृंगार, ना बिंदी, ना सिन्दूर…ना मांग में चमकता मंगलसूत्र।बस एक रंग की सादी सी साड़ी…और उस पर एक सफेद पड़ा चेहरा,जैसे सालों से धूप देखी ही न हो।महक ने गौरव की तस्वीर के सामने दीपक रखा और बुदबुदाई —"क्यों छोड़कर चले गए…?आज तो दीवाली है, कैसे रहूँगी आपके बिना?""7 साल हो गए…""आपने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में…बच्चों के बारे में…हमें तो जैसे बीच भँवर में छोड़ दिया आपने।"गौरव की तस्वीर पर सिर रखकर वो जोर-जोर से रोने लगी।उसकी चीखती सिसकियाँ सुनकर परी और माधव भागते हुए आए ...Read More
MTNL की घंटी - 16
थोड़ी देर की खामोशी के बाद ताया जी बोले, “कल रविवार है…मैं टिकट बुक करवा देता हूँ---देहरादून की"महक ने गहरी साँस ली…शायद पहली बार वर्षों बाद उसने अपने दिल की दीवार को थोड़ा ढीला पड़ते महसूस किया।“अगर मैं चली गई… और यादें भी साथ आ गईं तो?” महक ने बहुत धीमे से कहा।“तो उन्हें भी हवा, बादल, पहाड़ दिखाओ…शायद वो भी हल्की हो जाएँ,” ताया जी मुस्कुराए।बेंच पर बैठी महक ने पहली बार आसमान की ओर देखा और उसे वो चमकती हुई सी लाइन नहीं, मुस्कुराता हुआ आसमान नजर आया । ...Read More
MTNL की घंटी - 17
महक हाल से बाहर आ गई थी। भीतर की भीड़, शोर और हवा में फैली हुई परफ्यूम की मिली-जुली उसे घुटन जैसी लग रही थी। बाहर निकलते ही हल्की-हल्की बूंदें उसके चेहरे को छू गईं। हवा में ठंडक थी, और उसके शरीर में एक हल्का सा बुखार पहले से ही दस्तक दे चुका था, पर बारिश में भीगने का आकर्षण उसे अंदर खींच रहा था।वह यूँ ही खड़ी थी, जैसे किसी अनजानी सोच में डूबी हो, तभी एक गंभीर और नरम आवाज़ पास से आई—"महक जी?"वो चौंकी, मुड़ कर देखा — एक सौम्य, सधे हुए चेहरे वाले व्यक्ति उसके ...Read More
MTNL की घंटी - 18
महक जैसे ही हॉल में दाखिल हुई, हल्की-सी हलचल हुई। कई लोगों ने उसकी ओर देखा — उसकी सादगी, मुस्कुराहट और उसके चेहरे की वो शांत चमक जैसे सबको कुछ पल ठहरने पर मजबूर कर रही थी।हाल की हल्की रौशनी, सामने सजा हुआ मंच, और पीछे बजता धीमा संगीत — सब कुछ मानो किसी पुराने ख़्वाब जैसा लग रहा था।महक ने मंच के किनारे खड़े हो कर गहरी साँस ली।“स्कूल में तो जाने कितनी बार स्टेज पर बोला है… पर आज... ये घबराहट क्यों हो रही है?”शायद इसलिए कि आज वो सिर्फ एक भाषण नहीं, अपना अस्तित्व बोलने जा ...Read More
MTNL की घंटी - 19
हाल में सब कुछ शांत था। कार्यक्रम खत्म हो चुका था।लोग धीरे-धीरे अपनी सीटों से उठ रहे थे, बातें रहे थे, किताबों पर चर्चा कर रहे थे।लेकिन महक की नज़रें कुछ और ही खोज रही थीं…तभी दौड़ती हुई परी आई —“मम्मा!!! आपने कितना अच्छा बोला!”फिर पीछे से माधव भी आया,“मम्मा सबने ताली बजाई… आप स्टार हो गई हो!”महक उन दोनों को देखकर हल्के से मुस्कराई, लेकिन आँखों में जो चमक थी वो आँसूओं से भीगी हुई थी।उसने दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया।जैसे इन दो मासूम दिलों के बीच खुद को छुपा लेना चाहती हो।बच्चों ने कुछ ...Read More
MTNL की घंटी - 20
महक रिसेप्शन की ओर बढ़ ही रही थी कि पीछे से किसी ने सख़्त आवाज़ में पुकारा—"महक!"वो ठिठक गई। देखा तो सुधा और आलोक सामने खड़े थे।सुधा की आँखों में गुस्सा था, और आलोक की आँखों में नाराज़गी।"इतना बड़ा फ़ैसला अकेले कैसे ले सकती हो तुम?" सुधा की आवाज़ थरथरा रही थी।महक ने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया।आलोक चुपचाप खड़े रहे, पर उनकी ख़ामोशी बहुत कुछ कह रही थी।सुधा ने इशारे से दोनों बच्चों को कमरे में भेज दिया।बच्चे ख़ुश थे, उनके चेहरों पर एक सुकून था।"थैंक्यू!" कहते हुए वो अंदर चले गए।सुधा ने एक गहरी साँस ...Read More
MTNL की घंटी - 21
महक के दिमाग़ मे देव जी का NGO घूम रहा थाक्योकि उसने देव का एक काल्पनिक चित्र अंकित किया अपने मन मेसोचा था —"अगर देव जी देहरादून में हैं... तो जरूर टूटे-बिखरे होंगे। शायद एकदम साधारण कपड़ों में, जैसे कोई सन्यासी… शायद लंबे बाल, चुपचाप निगाहें झुकाए... जैसे वक्त ने उनसे सब छीन लिया हो।"पर महक की सोच… पूरी तरह से गलत निकली।............शाम के 4 बज चुके थे महक और सबको 5 बजे तक एंट्री लेनी थीरिसोर्ट के हॉल की ओर जाते हुए, ठीक सामने से एक तेज़ चाल में कुछ लोग आते दिखे आलोक जी के साथसबसे आगे ...Read More
MTNL की घंटी - 22
जिंदगी के कुछ पल ऐसे होते है जो सिर्फ कुछ एहसास देते है.. उन्हे महसूस किया जा सकता है भी कुछ देर इन पलो मे रहना चाह्ती थी पर वक़्त इजाजत नही दे रहा था।-------महक जैसे ही हाल में पहुँची, उसकी नज़र सबसे पहले ताया जी और ताई जी पर पड़ी।वो खुशी से मुस्कराई, दिल जैसे हल्का हो गया हो।"ताया जी! ताई जी!" वो तेज़ी से उनके पास भागी और दोनों के पैर छूकर झुक गई।ताई जी ने उसे आशीर्वाद देते हुए गले से लगा लिया, और ताया जी की आंखें भर आईं।"बेटी की खुशी में शामिल होने न ...Read More
MTNL की घंटी - 23
रात का समय था। हवाओं में हल्की ठंडक घुली थी और डाइनिंग हॉल में गर्माहट थी — प्यार, रिश्तों स्वाद से भरी।टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन सजे थे — शाही पनीर, तंदूरी रोटी, पुलाव, गुलाब जामुन… चाऊमीन, पिज़्ज़ा और भी न जाने क्या-क्या।परी और माधव फूले नहीं समा रहे थे।"मम्मी! आज तो होटल वाला खाना है!" परी चहक कर बोली।"मैं तो सबकुछ खाऊँगा!" माधव ने प्लेट उठा ली और सबको हँसा दिया।सिर्फ एक चेहरा था जो अब तक नहीं दिखा — देव।"अभी तक नहीं आया?" आलोक ने घड़ी की ओर देखा।"आ जाएंगे, शायद किसी लेखक को छोड़ने गए हों," ...Read More
MTNL की घंटी - 24
सारे दृश्य महक के ज़ेहन में तैरने लगे —गौरव का चुप-चाप खिंचा-खिंचा रहना, हर बार पैसों की बात से करना, बच्चों की मासूमियत को नज़रअंदाज़ करना,और फिर एक दिन...बस यूँ ही...बिना कुछ कहे...चला जाना।महक की आँखों में सन्नाटा था, और दिल में अधूरा सवाल।तभी ताया जी की भारी आवाज़ गूंज उठी —"बेटा... हमारी तो कोई औलाद नहीं थी...तुम दोनों ही तो थे, हमारी पूरी दुनिया।तुम्हें क्या लगा... हम नहीं टूटे उस दिन?जब गौरव गया... जब सब छिन गया..."उनकी आँखें भर आईं।"हमने खुद को समेटा, सिर्फ तुम्हारे लिए... और दोनो बच्चों के लिए।ना पैसा रहा, ना साथ... और रिश्तेदार?वो तो ...Read More
MTNL की घंटी - 25
देव ने चुपचाप कार का दरवाज़ा खोला। महक का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखों में डर, दर्द टूटी हुई उम्मीदें। उसके काँपते कदम जैसे खुद भी नहीं जान रहे थे कहाँ जा रहे हैं।देव ने उसका हाथ थामा।“महक... बस कुछ देर... यहां से दूर चलें,” उसकी आवाज़ में वो स्थिरता थी, जो बिखरे हुए मन को थाम ले।महक बिना कुछ कहे कार में बैठ गई। उसके चेहरे पर गहराता दर्द देखकर देव का दिल कसक उठा। रास्ते भर महक खिड़की की ओर देखती रही — मौन, मगर भीतर तूफ़ान सा हाहाकार।रिसॉर्ट की चहल-पहल से दूर, किसी सुनसान ...Read More
MTNL की घंटी - 26
महक और देव दोनों सुबह-सुबह रिसोर्ट लौट आए।देव ने आते ही आदरपूर्वक ताया जी के चरण छुए।ताया जी ने सीने से लगा लिया — उस आलिंगन में आशीर्वाद और अपनापन दोनों शामिल थे।महक थोड़ी झुकी-झुकी नज़रों के साथ आगे बढ़ी और ताया जी के पांव छू लिए।ताया जी ने उसका सिर सहलाया, लेकिन कुछ कहा नहीं — जैसे सब कुछ समझकर भी कुछ भी कहने का समय अभी नहीं आया हो।थोड़ी ही देर में आलोक और सुधा भी वहां पहुंच गए।उनकी नजरें देव और महक के चेहरों पर ठहर गईं — उन दोनों के भावों में जो शांति और ...Read More
MTNL की घंटी - 27
दिल्ली की सर्दी में कमरे की गरमाहट और गाजर के हलवे की खुशबू जैसे किसी को बचपन की मीठी में ले जाए।महक ने एप्रन उतारते हुए जल्दी-जल्दी हाथ धोए और दरवाज़े की ओर भागी।नीचे से ताया जी की आवाज आई —"महक, देखो तुमसे मिलने कौन आया है!"महक की धड़कन अनजाने से उत्साह में तेज़ हो गई।जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने आलोक और सुधा जी खड़े थे।सर्द हवा में भी सुधा जी की आँखों में अपनापन और गर्मजोशी थी।महक को देखते ही उन्होंने उसे कसकर गले से लगा लिया,मानो बरसों का कोई इंतज़ार आज पूरा हो गया हो। महक ...Read More
MTNL की घंटी - 28
महक चबूतरे पर बैठी थी, पैरों के पास फैली रजनीगंधा की खुशबू हवा में घुल रही थी।उसके होंठों पर शब्द बह रहे थे—" जो ख़तम हो किसी जगह, यह ऐसा सिलसिला नहीयही कहोगे तुम सदा...के दिल अभी भरा नही..."पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई,"अभी-अभी आई हो… अभी न जाओ छोड़कर…"महक ने पलटकर देखा—देव वहाँ खड़ा था, आँखों में वही पुराना अपनापन, वही बिन कहे वादा।देव उसके पास आकर बैठा, और बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में खींच लिया। दोनो अपना अपना एक बुरा दौर छोड़ कर नयी मोहबत की दुनिया मे कदम रख रहे थे।उस पल में कोई ...Read More
MTNL की घंटी - 29
सुबह की पहली किरणें NGO मे खिड़की से झाँक रही थीं।रसोई से आती खुशबू पूरे घर में फैल रही ने नाश्ते में पूड़ी, आलू की सब्ज़ी, पराठे, बेसन का चिल्ला, और गरमा-गरम चाय सब कुछ तैयार कर दिया था।बच्चे भी आज जल्दी उठ गए, क्योंकि वह देव के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते थे।हँसी-ठिठोली के बीच आलोक और सुधा भी आ पहुँचे।"अरे वाह, महक… इतने सारे पकवान! लगता है आज हम पेट पकड़कर ही उठेंगे," सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा।"वाह देवर जी आज तो आप जी भर कर खायेंगे आज तो परहेज नही करेंगे" सुधा ने छेड़ते ...Read More
MTNL की घंटी - 30
दिल्ली से देहरादून का सफ़र मानो किसी फ़िल्म का धीमा-सा खूबसूरत गीत बन गया था।रास्ते भर परी अपने छोटे से गिटार की तारें छेड़ती रही—कभी सुर सही लगते, कभी उलझ जाते,लेकिन उन अधूरे सुरों में भी एक मीठा सा सुकून था।आलोक मुस्कुराकर बोला,"परी, यह गिटार तो देव का है… और यह मेरे बेटे प्रकाशका भी favourite था।"थोड़ी देर ठहरकर उसने जोड़ दिया,"वो MBBSपढ़ाई के लिए London गया है, पर जल्दी ही वापिस लौट आएगा अपनी पढ़ाई पूरी करके।सुधा ने मुस्कुराकर कहा,"प्रकाश को देव से इतना लगाव है कि वो हमारे साथ कम, देहरादून ज़्यादा रहता है।कहता है—देव से बातें ...Read More
MTNL की घंटी..(special episode)
इंसान अपने मुताबिक़ रंग चुनता हैउसे लगता है की वो रंग चुनने माहिर हैजैसे...वह अपनी खुशी दर्शाने के लिएकभी चुनता है,कभी सफेद याकभी काला।ग़म की तस्वीर मेंकभी काले रंग भरता है,तो कभी हरे या;फिर वही सफेद।पर सच तो ये है—रंग इंसान नहीं चुनता,रंग तो ऊपर वाला रंगता हैरंगरेज़ जो है वो....उसके हाथ में है ब्रश, रंग हैवो अपनी मर्ज़ी से रंग भरता हैंजीवन के कैनवस पर।हम तो बस उसके बनाए चित्र कोकभी समझ नहीं पाते,और रंगों से ही नाराज़ हो जाते हैं।देव जी......आपने सारे प्रश्नों के उत्तर ग़लत दिए थे।आसमान नीला नहीं होता —वो तो सफेद होता है।बस, ऊपर ...Read More
MTNL की घंटी - 32
2002 की दिल्ली…उस समय चुनिंदा घरों में ही MTNL का फोन बजा करता था।घंटी की हर टन-टन के साथ ऊपर-नीचे होती थीं।खुशियाँ हों या ग़म, जीना-मरना सब उसी फोन से तय होता था।इसी घंटी ने महक और देव की मोहब्बत की शुरुआत भी करवाई थी।2013 तक आते-आते दिल्ली बदलने लगी।पुराने हवेलीनुमा घर अब फ्लैट्स में बदल गए।मेट्रो दिल्ली की धड़कन बन चुकी थी और MTNL लगभग इतिहास हो गया था।उसकी जगह मोबाइल फोन ने ले ली थी।फेसबुक और व्हाट्सएप पर अनजाने लोग अपनों से ज़्यादा क़रीब हो गए,और अपने ही धीरे-धीरे दूर होते चले गए।इस साल ने देव और ...Read More
MTNL की घंटी - 33
अगले दिन सुबह राउंड पर डॉक्टर प्रकाश और डॉक्टर अनन्या साथ-साथ मरीजों को देख रहे थे। अनन्या अब थोड़ी से भरी हुई लग रही थी।एक मरीज के चार्ट को देखते हुए प्रकाश बोले—“देखिए डॉक्टर अनन्या, ये पेशेंट डायबिटिक है। मीठा बिल्कुल बंद।”अनन्या ने तुरंत कहा—“लेकिन सर, उसकी शुगर आज नॉर्मल है। थोड़ा फ्रूट जूस तो दिया जा सकता है।”प्रकाश ने भौंहें उठाईं—“आपको लगता है आप मुझसे ज़्यादा जानती हैं?”अनन्या ने धीरे से कहा—“सर, आपसे ज़्यादा नहीं… लेकिन मरीज की मुस्कान बनाए रखना भी डॉक्टर का काम है।”प्रकाश ने गहरी साँस ली और ऊँचे स्वर में कहा—“डॉक्टरी इमोशन से नहीं, ...Read More
MTNL की घंटी - 34
डॉक्टर प्रकाश 22 साल के मरीज की जिम्मेदारी अनन्या को सौंपकर प्रोग्राम मे चले गए।रात भर ICU में अनन्या पूरी तन्मयता से उसकी हालत पर नज़र रखी।भोर के करीब पाँच बजे थकान ने उसे घेर लिया। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला।इसी बीच डॉक्टर प्रकाश आ गए। उन्होंने पहले सीधे मरीज को देखा, रिपोर्ट्स चेक कीं, दवाइयाँ बदलीं।फिर उनकी नज़र अनन्या पर पड़ी। सोई हुई अनन्या की कुर्सी के हत्थे पर हाथ रखकर प्रकाश उसके मुँह के पास झुक गए… वह अपना चेहरा उसके बिल्कुल करीब ले गये।जैसे ही अनन्या ने ...Read More
MTNL की घंटी - 35
85 साल के बुजुर्ग बाबा पिछले तीन महीनों से अस्पताल के कमरे में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल थे। उम्र ने तो उन्हें झुका ही दिया था, लेकिन असली जंग उनके शरीर के अंग लड़ रहे थे। किडनी पूरी तरह से जवाब दे चुकी थी, लिवर भी लगभग काम करना बंद कर चुका था और दिल किसी भी क्षण धड़कना छोड़ सकता था। लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी। हर नर्स, हर अटेंडेंट उन्हें देख कर हैरान रह जाता था कि इतनी बीमारी और दर्द के बावजूद ये इंसान इतना जिंदादिल कैसे रह ...Read More
MTNL की घंटी - 36
सर...उस समय ड्यूटी डॉक्टर रुद्र नही डॉक्टर अनन्या थी""अनन्या.....मैने रुद्र को कहा भी था की अनन्या को दूर रखना केस से ...फिर भी"प्रकाश ने गहरी सांस ली, खुद को संभालने की कोशिश की।"सिस्टर , वो होश मे थे? मेरे बारे मे पूछ रहे थे?उनके आख़िरी पल… कैसे थे?”सिस्टर ने हिचकिचाते हुए कहा—"सर पूरे होश मे थे आपको भी पूछ रहे थे और हां बार बार फिर से जलेबी मांग रहे थे ।"प्रकाश अनमने मन से वापिस मुड़ने लगे तभी सिस्टर ने रोक कर कहा“सर… अनन्या ने उन्हें जलेबी खिला दी थी… बस उसी के बाद…”ये सुनते ही प्रकाश का ...Read More