नागबंधन: मुक्ति का श्राप.

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इतना घना कि सूरज की सुनहरी किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही थककर बिखर जाती थीं। यहाँ रोशनी का प्रवेश वर्जित था। पत्तों की अनगिनत परतें ऊपर से नीचे तक ऐसे एक-दूसरे में गुथी हुई थीं मानो किसी ने जानबूझकर आकाश को धरती से छिपा दिया हो। यहाँ दिन के बारह बजे भी एक अजीब-सा, मटमैला धुंधलका छाया रहता था—न पूरा उजाला, न पूरी रात। बस एक अंतहीन गोधूलि बेला, जो कभी खत्म नहीं होती थी।

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 1

अध्याय 1जंगल का श्रापघना जंगल—इतना घना कि सूरज की सुनहरी किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही थककर जाती थीं। यहाँ रोशनी का प्रवेश वर्जित था। पत्तों की अनगिनत परतें ऊपर से नीचे तक ऐसे एक-दूसरे में गुथी हुई थीं मानो किसी ने जानबूझकर आकाश को धरती से छिपा दिया हो। यहाँ दिन के बारह बजे भी एक अजीब-सा, मटमैला धुंधलका छाया रहता था—न पूरा उजाला, न पूरी रात। बस एक अंतहीन गोधूलि बेला, जो कभी खत्म नहीं होती थी।हज़ारों साल पुराने बरगद और सागौन के पेड़ आसमान को चीरते हुए, किसी मूक प्रहरी की तरह खड़े थे। ...Read More

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 2

अध्याय 2नया घर, नई उलझनेंशिवांशी की नींद किसी झटके के साथ टूटी।उसका शरीर ठंडे पसीने से तर-बतर था और सीने के अंदर किसी हथौड़े की तरह बज रहा था। उसने फौरन उठकर बैठने की कोशिश की, लेकिन सर में एक तेज़ टीस उठी। अंधेरे कमरे में उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। कुछ पलों के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है। चारों ओर एक भारी और दमघोंटू सन्नाटा था, जिसमें केवल उसकी अपनी तेज़ और उखड़ी हुई साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।"सिर्फ एक सपना था..." उसने लंबी और कँपकँपाती साँस ली, खुद को ...Read More

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 3

खौफनाक रात के बाद की सुबह उम्मीद से कहीं ज़्यादा उजली थी।रात भर की मूसलाधार बारिश ने हवा को साफ़ कर दिया था। जब शिवांशी की आँख खुली, तो सूरज की किरणें खिड़की के काँच से छनकर उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। कल रात का वह खौफ, वह विशाल परछाईं और साँप—दिन के उजाले में सब कुछ किसी धुंधली याद जैसा लग रहा था। शिवांशी ने एक गहरी साँस ली। वह महादेव की अनन्य भक्त थी, और उसका अटूट विश्वास था कि जहाँ शिव का वास है, वहाँ अमंगल नहीं हो सकता। फिर भी, वह सपना और वे ...Read More