बनारस,1952, गंगा के किनारे वाली पुरानी हवेली जैसी लाइब्रेरी। छत तक ऊँची अलमारियाँ, लकड़ी की खुशबू, और पंखे की धीमी चिर-चिर। रवि वहीं लाइब्रेरी में हिसाब-किताब और किताबें संभालता था। एम.ए. कर रहा था, पर घर की हालत की वजह से नौकरी करनी पड़ती थी। सादा, सफेद कुर्ता और आँखों में किताबों जैसी गहराई। मीरा उसी शहर के सबसे बड़े ज़मींदार की बेटी थी। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ी पर उसे हिंदी साहित्य से प्यार था। हर मंगलवार और शुक्रवार वो पढ़ने आती। हमेशा एक ही कोना, हमेशा एक ही किताब... और बीच-बीच में रवि से एक-दो सवाल।
किताबों के बीच - पार्ट 1
किताबों के बीचby PATEL RJबनारस,1952, गंगा के किनारे वाली पुरानी हवेली जैसी लाइब्रेरी। छत तक ऊँची अलमारियाँ, लकड़ी की और पंखे की धीमी चिर-चिर।रवि वहीं लाइब्रेरी में हिसाब-किताब और किताबें संभालता था। एम.ए. कर रहा था, पर घर की हालत की वजह से नौकरी करनी पड़ती थी। सादा, सफेद कुर्ता और आँखों में किताबों जैसी गहराई।मीरा उसी शहर के सबसे बड़े ज़मींदार की बेटी थी। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ी पर उसे हिंदी साहित्य से प्यार था। हर मंगलवार और शुक्रवार वो पढ़ने आती। हमेशा एक ही कोना, हमेशा एक ही किताब... और बीच-बीच में रवि से एक-दो सवाल।पहले सिर्फ ...Read More
किताबों के बीच - पार्ट 2
*हिस्सा 1: लौट आना (1972)*1972. बनारस में गंगा अब भी वैसी ही बहती थी, पर घाट पर अब बिजली बल्ब लग गए थे।लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ अब और घिस गई थीं। रवि के बाल पूरे सफेद हो गए थे। चश्मा मोटा हो गया था। पर एक चीज अभी भी वैसी थी — मंगलवार और शुक्रवार, 4 बजे। वो मेज़ अभी भी खाली रखता था। सफाई वाला कहता "बाबू जी, ये मेज़ कोई इस्तेमाल नहीं करता, हटा दूँ?" रवि कहता "रहने दो। आदत है।"एक शुक्रवार, 4 बजकर 5 मिनट पर घंटी बजी।दरवाजे पर एक लड़की खड़ी थी। लंबी, हाथ में झोला, ...Read More