संत कबीर जी के इस दोहे को अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी हमें डरा रहे हैं या जीवन से निराश कर रहे हैं कि “जब अंत में मिट्टी ही होना है, तो मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह निराशा की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है। गहरे अर्थ की व्याख्या यहाँ मिट्टी और कुम्हार के माध्यम से समय के चक्र को समझाया गया है। कुम्हार मिट्टी को अपने पैरों से कुचलता है ताकि वह घड़ा बना सके। तब मिट्टी उसे याद दिलाती है कि आज वक्त तुम्हारा है, इसलिए तुम मुझ पर हावी हो। लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जब यह जीवन समाप्त होगा, तब तुम इसी मिट्टी में समा जाओगे और मैं तुम्हारे ऊपर आ जाऊँगी। कबीर जी यहाँ किसी को डरा नहीं रहे, बल्कि हमें अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दे रहे हैं।
अमृत वाणी - संत वाणी - 1
“माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोहि।इक दिन ऐसा होयगा, मैं रौंदूगी तोहि।।”संत कबीर जी के इस दोहे अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी हमें डरा रहे हैं या जीवन से निराश कर रहे हैं कि “जब अंत में मिट्टी ही होना है, तो मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह निराशा की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।गहरे अर्थ की व्याख्यायहाँ मिट्टी और कुम्हार के माध्यम से समय के चक्र को समझाया गया है। कुम्हार मिट्टी को अपने पैरों से कुचलता है ताकि वह ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 2
संत रहीम दास जी का यह दोहा समाज में ऊंच-नीच के भेद को मिटाकर हर व्यक्ति का सम्मान करना है।“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि।।”अक्सर लोग इस दोहे को पढ़कर सोचते हैं कि क्या बड़े लोगों या बड़ी चीज़ों का कोई महत्व नहीं है? लेकिन रहीम जी यहाँ बड़े लोगों का अपमान नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमें हर छोटी-से-छोटी चीज़ और छोटे व्यक्ति की अनूठी कीमत (Value) समझा रहे हैं।गहरे अर्थ की व्याख्या :इस संसार में जब किसी व्यक्ति को बड़ा पद, पैसा या प्रभाव मिल जाता है, तो ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 3
संत तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई जीवन में सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप क्या है, इसे ही सीधे और तार्किक तरीके से समझाती है। इसे बिना किसी भ्रम और सटीक उदाहरण के साथ नीचे तैयार किया गया है:“पर हित सरिस धरम नहिं भाई।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।”अक्सर लोग पुण्य कमाने के लिए कठिन व्रत, अनुष्ठान या दूर-दूर की यात्राएं करते हैं। लेकिन तुलसीदास जी ने इस चौपाई में पुण्य की एक बेहद सरल और व्यावहारिक परिभाषा दी है, जिसे हर आम इंसान अपने दैनिक जीवन में अपना सकता है।गहरे अर्थ की व्याख्यातुलसीदास जी कहते हैं कि ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 4
“जे का रंजले गांजले। त्यासी म्हणे जो आपुले।तोचि साधु ओळखावा। देव तेथेचि जाणावा।।”संत तुकाराम जी महाराज का यह अभंग ही सीधा, सरल और मन को छू लेने वाला है। वे यहाँ समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति इस संसार के दुखी, गरीब और असहाय लोगों को अपना समझकर गले लगाता है, वही वास्तव में सच्चा संत है और ईश्वर साक्षात वहीं निवास करते हैं।संत तुकाराम जी स्वयं भगवान विट्ठल के बहुत बड़े भक्त थे। वे इस अभंग के माध्यम से हमें भक्ति का एक बहुत ही व्यावहारिक रूप दिखा रहे हैं।व्यावहारिक उदाहरणइसे हम एक बहुत ही सीधे उदाहरण से ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 5
“रहिमन ओछे नरन सो, बैर भलो न प्रीति।काटे चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीत।।”रहीम जी का यह कालजयी दोहा समाज में जीने, इंसानी स्वभाव को पहचानने और व्यावहारिक जीवन (Social Wisdom) को कुशलता से चलाने का अचूक मंत्र देता है।रहीम जी स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि जो लोग ओछे (संकीर्ण मानसिकता वाले), नकारात्मक, स्वार्थी या दुर्जन स्वभाव के होते हैं, उनसे न तो दुश्मनी (बैर) अच्छी होती है और न ही बहुत ज़्यादा गहरी दोस्ती (प्रीति)। ऐसे लोगों से हमेशा एक गरिमामय और मर्यादित दूरी (Healthy Boundary) बनाकर रखनी चाहिए, क्योंकि आप उनसे चाहे जैसा रिश्ता रखें, अंत ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 6
“विद्येविना मती गेली, मतीविना नीती गेली।नीतीविना गती गेली, गतीविना वित्त गेले।वित्ताविना शूद्र खचले, इतके अनर्थ एका अविद्याने केले।।”ज्योतिबा फुले कहते हैं कि शिक्षा (ज्ञान) के बिना बुद्धि चली जाती है। जब बुद्धि नहीं होती, तो इंसान की नैतिकता (सही-गलत की समझ) समाप्त हो जाती है। जब नैतिकता नहीं होती, तो जीवन की प्रगति (विकास) रुक जाती है। प्रगति रुकने से धन और समृद्धि चली जाती है। और धन-सम्मान के बिना इंसान पूरी तरह टूट जाता है। जरा सोचिए, ये सारे अनर्थ सिर्फ एक 'अज्ञानता' (शिक्षा न होने) के कारण होते हैं।अक्सर लोग इस वाणी को केवल एक सामाजिक भाषण ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 7
“क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।” –(श्रीमद्भगवद गीता - अध्याय 2, श्लोक 63)अक्सर लोग क्रोध को केवल एक क्षणिक भावना मानते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण इस श्लोक में क्रोध के उस खतरनाक वैज्ञानिक चक्र को समझा रहे हैं जो पल भर में इंसान का पूरा जीवन बर्बाद कर सकता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि में संमोह (मूढ़ता या अंधकार) पैदा होता है। बुद्धि में अंधकार छाने से उसकी स्मृति (याददाश्त और सही-गलत की समझ) भ्रमित हो जाती है। स्मृति भ्रमित होने से मनुष्य की बुद्धि का नाश हो जाता है। और जिस मनुष्य की बुद्धि का नाश ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 8
“प्यार और विनम्रता ही जीवन के सच्चे आभूषण हैं, बाकी सब केवल बाहरी दिखावा है।”यह विचार आज के इस और दिखावे के युग के लिए एक बहुत बड़ा जीवन-मंत्र है, जहाँ लोग बाहरी सुंदरता को ही सब कुछ मान बैठे हैं।गहरे अर्थ की व्याख्यासंत तिरुवल्लुवर जी कहते हैं कि मनुष्य का असली मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि उसने कितने महंगे कपड़े पहने हैं या उसके पास कितनी बड़ी गाड़ी है। मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके ‘चरित्र’ से झलकता है। जिसके भीतर हर जीव के प्रति ‘प्यार’ (Love) है और जिसके व्यवहार में ‘विनम्रता’ (Humility) है, ईश्वर ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 9
“वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे।पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।।”गहरे की व्याख्यानरसी मेहता जी इस भजन में कहते हैं कि ईश्वर का सच्चा भक्त या धार्मिक इंसान (वैष्णव) केवल वही है जो ‘पीर पराई जाणे’ अर्थात दूसरों के दुःख, दर्द और पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है, वह दुखी और असहाय लोगों की मदद करता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात—दूसरों पर उपकार या उनकी मदद करने के बाद भी उसके मन में रत्ती भर भी घमंड (अभिमान) नहीं आता कि “मैंने किसी की मदद की है।”व्यावहारिक उदाहरणइसे आप चिकित्सा या ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 10
“हर जीव के भीतर साक्षात नारायण का वास है, इसलिए किसी भी प्राणी को छोटा या अछूत समझना ईश्वर अपमान है।”शंकरदेव जी ने 15वीं-16वीं शताब्दी में असम में एक महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्रांति की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘एकशरण नाम धर्म’ का प्रचार किया, जिसका मूल आधार ही यही था कि परमेश्वर एक हैं और उनकी बनाई इस दुनिया में सभी बराबर हैं।गहरे अर्थ की व्याख्यामहाप्रभु शंकरदेव जी कहते हैं कि परमात्मा केवल मंदिरों की मूर्तियों या आसमान में ही नहीं बैठे हैं। वे इस संसार के हर एक जीव—चाहे वह एक अमीर व्यक्ति हो, एक गरीब मजदूर ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 11
“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥” — संत मलूक दासअक्सर इस दोहे को सतही तौर पर पढ़कर बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि मलूक दास जी हमें आलसी बनने, कामधंधा छोड़ने या भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठने की सलाह दे रहे हैं। लोग सोचते हैं कि “अगर भगवान को ही सब देना है, तो हम मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह दोहा आलस का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव से मुक्ति और ब्रह्मांड की व्यवस्था पर ‘परम विश्वास’ का सबसे बड़ा ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 12
हम अक्सर अपनी असफलताओं के लिए अपनी किस्मत या अपनी मेहनत को दोष देते हैं। लेकिन क्या आप जानते कि आपके आस-पास मौजूद लोग और विचार आपके जीवन की दिशा तय कर रहे हैं? संत तुलसीदास जी ने इस बात को प्रकृति के एक बेहद खूबसूरत उदाहरण से समझाया है :“कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन॥” — संत तुलसीदास(स्वाति नक्षत्र की बूंद तो एक ही होती है, लेकिन अलग-अलग संगति के कारण उसके तीन रूप हो जाते हैं। यदि वह केले के पेड़ पर गिरे तो कपूर, सीप में गिरे तो ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 13
हम अक्सर जिंदगी में उन चीजों को हासिल करने के लिए दिन-रात दौड़ रहे हैं, जिन्हें हम मरने के साथ नहीं ले जा सकते। इस अंधी दौड़ में हम बाहर से तो बहुत अमीर या कामयाब दिखते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही अकेले और बेचैन होते हैं। गुरु नानक देव जी ने इस मानवीय स्वभाव को एक बेहद सरल और गहरे सत्य से समझाया है:“मनुख बिनु बूझे बिरथा आया।कचहु कंचनु कहु की कीआ, निहचलु कछु न पाइआ।” — श्री गुरु ग्रंथ साहिब (गुरु नानक देव)इस वाणी को पढ़कर लोग अक्सर यह गलत मतलब निकाल लेते हैं कि गुरु ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 14
हम इंसानों की एक बहुत अजीब आदत है। हम उस कल के बारे में सोच-सोचकर आज घुटते रहते हैं, अभी तक आया ही नहीं है। हमारा आधा जीवन उन मुसीबतों के बारे में चिंता करने में बीत जाता है, जो असल में कभी हमारे जीवन में आती ही नहीं। हम अपने विचारों के पिंजरे में खुद ही कैद हो जाते हैं। इस मानसिक बीमारी को बहुत गहराई से समझते हुए कबीर जी कहते हैं:“चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाय।वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाय॥” — संत कबीरदासइस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक गहरे विरोधाभास में उलझ ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 15
हम अक्सर किसी व्यक्ति के बाहरी ठाट-बाट, महंगे कपड़ों, सोने के गहनों या उसकी मीठी-मीठी चिकनी बातों को देखकर बहुत महान और अच्छा इंसान मान लेते हैं। लेकिन कई बार उस चमक-दमक के पीछे एक बहुत ही कड़वा, कपटी और स्वार्थी स्वभाव छिपा होता है। इसके विपरीत, एक सच्चा और ईमानदार इंसान बाहर से बहुत सीधा और साधारण दिख सकता है। इस इंसानी स्वभाव के अंतर को संत वेमना ने प्रकृति के अद्भुत उदाहरण से समझाया है:“सोना टूटे तो जुड़े, सौ बार जुड़े सहर्ष।कनककुंभ सौ कनक के, माटी घट एक कर्ष॥”( यानी: सोना सौ बार भी टूटे तो अपनी ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 16
हम सब जीवन में ज्ञान पाना चाहते हैं, ईश्वर को खोजना चाहते हैं, और मन की शांति चाहते हैं। लिए हम मोटी-मोटी किताबें पढ़ते हैं, बड़े-बड़े प्रवचन सुनते हैं और खुद को बहुत ज्ञानी समझने लगते हैं। लेकिन इतना सब करने के बाद भी हमारा गुस्सा, हमारा लालच और हमारी बेचैनी वैसी की वैसी ही बनी रहती है। इस खोखले ज्ञान और आंतरिक सच्चाई के अंतर को संत रामकृष्ण परमहंस जी ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया है:“किताबों के भीतर ‘पंचांग’ (कैलेण्डर) तो होता है, और उसमें लिखा भी होता है कि इस साल इतनी भारी बारिश ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 17
हम अक्सर सोचते हैं कि पवित्रता केवल सुबह नहा-धोकर मंदिर जाने, ग्रंथों को छूने या ऊंचे सामाजिक बंधनों को में है। हम बाहर से तो बहुत साफ-सुथरे और शुद्ध बन जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर समाज के कमजोर लोगों के प्रति छुआछूत, भेदभाव और कड़वाहट बनी रहती है। इस खोखली शुद्धता को तोड़ते हुए एकनाथ महाराज ने समझाया कि असली पवित्रता बाहर के छुआछूत में नहीं, बल्कि मन की करुणा में है। उनका एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध विचार है:“जिसके हृदय में दया, क्षमा और शांति का वास है, साक्षात परमात्मा वहीं निवास करते हैं। ईश्वर को ढूंढने ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 18
हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे जीवन में दुख इसलिए है क्योंकि हमारे पास साधनों की कमी है। लेकिन हम ईमानदारी से अपने मन की जांच करें, तो हमें पता चलेगा कि हम अपने दुखों से उतने दुखी नहीं हैं, जितने दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होते हैं। पड़ोसी की नई गाड़ी, दोस्त का नया प्रमोशन या सोशल मीडिया पर किसी की चकाचौंध देखकर हमारा मन अंदर ही अंदर सुलगने लगता है। इस मानसिक बीमारी को संत सुंदरदास जी ने बहुत ही करारे शब्दों में समझाया है:“पर सुख देखि न सकत जिय, जरि-बरि होवत छार।सुंदर ऐसे मनुष को, ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 19
हम सब दिन-रात इस तलाश में भाग रहे हैं कि कहीं से हमें थोड़ा सुख और मन का सुकून जाए। हम सोचते हैं कि जब बहुत सारा पैसा आ जाएगा, बड़ा घर मिल जाएगा या बड़ी गाड़ी आ जाएगी, तब हम खुश होंगे। लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे बाहरी चीजें बढ़ती हैं, हमारे मन की भूख और ज़्यादा बढ़ती जाती है। इस अंतहीन दौड़ और असली सुख के रहस्य को संत तुकाराम जी ने बहुत सरलता से समझाया है:“तुका म्हणे सुख संतापाचे मूळ।चित्त समाधान नाही ज्या पाशी॥” — संत तुकाराम(अर्थ: तुकाराम जी कहते हैं कि जब तक तुम्हारे ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 20
हम पूरी जिंदगी इस कोशिश में बिता देते हैं कि समाज में हमारा एक बड़ा नाम हो, लोग हमसे करें, और हमारे सगे-संबंधी हमेशा हमारे अनुकूल रहें। लेकिन इस दुनिया का एक बहुत कड़वा नियम है—यहाँ हर रिश्ता किसी न किसी शर्त या स्वार्थ पर टिका होता है। जब तक आप दूसरों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं, सब आपके साथ हैं; जिस दिन परिस्थितियाँ बदलती हैं, सब अपनी राह पकड़ लेते हैं। इस सांसारिक अकेलेपन के बीच जो आत्मा को कभी न छूटने वाला सच्चा सहारा दे, वही असली सत्य है। मीराबाई जी ने इसे बहुत ही निडरता ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 21
हम अक्सर सोचते हैं कि बहुत बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान कर लेना, शरीर पर विशेष तरह के तिलक लगा लेना, दिन-भर केवल मंदिर-मस्जिद के चक्कर काट लेना ही सबसे बड़ी भक्ति है। हम बाहर से तो बहुत बड़े भक्त दिखाई देते हैं, लेकिन हमारे भीतर दूसरों के लिए नफरत, ईर्ष्या, लालच और गुस्सा वैसा का वैसा ही बना रहता है। इस बाहरी दिखावे और असली आंतरिक भक्ति के अंतर को संत सिंगाजी ने अपनी मालवी/निमाड़ी मिश्रित भाषा में बहुत ही सीधे शब्दों में समझाया है:“मन कूं न रंगाया, रंगाया तुम चोला।कहैं सिंगाजी सुनो भाई साधो, तुम तो मुख से राम-राम ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 22
हम अक्सर समाज में रहने के लिए दूसरों को खुश करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। लोग हमारी सी झूठी तारीफ या चापलूसी कर देते हैं, तो हम फूले नहीं समाते और उनके मानसिक गुलाम बन जाते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम अंदर से टूट जाते हैं। हमारा रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में चला जाता है। इस मानसिक गुलामी और विवेक की कमी को दूर करते हुए समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं:“शब्दांचे गौरव बहुत मानिती।अंतरींचे गुज काहीच न जाणती॥” — समर्थ रामदास स्वामी (दासबोध)(अर्थ: जो लोग केवल बाहरी मीठे शब्दों, झूठे ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 23
“जे जे भेटे भूत, ते ते मानिजे भगवंत।हा भक्तीचा पैं गा गाभा, जाणिजे सर्वथा॥” — संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी)( अनुवाद: चराचर संसार में तुम्हें जो भी जीव या प्राणिमात्र मिले, उसे साक्षात ईश्वर का ही रूप मानो। संत ज्ञानेश्वर जी कहते हैं कि संसार के हर छोटे-बड़े जीव के प्रति मन में आदर और सम्मान का भाव रखना ही सच्ची भक्ति का असली मर्म (सार) है।”)संत ज्ञानेश्वर जी के इस क्रांतिकारी विचार को अक्सर लोग बहुत सतही ढंग से समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि ज्ञानेश्वर जी हमें संसार के व्यावहारिक नियम छोड़कर हर अच्छे-बुरे इंसान के सामने बस ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 24
संत कबीरदास जी का यह दोहा समाज में ज्ञान और व्यवहार के गहरे अंतर को समझाकर जीवन को पूरी पारदर्शी और सच्चा बनाना सिखाता है।“कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।कथनी तजि करनी करे, विष से अमृत होय।।”गहरे अर्थ की व्याख्यासिर्फ मुंह से मीठी-मीठी बातें करना या दूसरों को ज्ञान की बातें सिखाना शक्कर (खांड) की तरह बहुत अच्छा और सुखद लगता है, लेकिन उन बातों को अपने खुद के व्यवहार में न लाना जहर की एक छोटी सी गोली की तरह नुकसानदेह होता है। जो व्यक्ति दूसरों को उपदेश देना और बड़ी-बड़ी बातें करना छोड़ देता है, ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 25
संत गुरु नानक देव जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के अन्याय और लालच को छोड़कर अपनी ईमानदारी मेहनत से जीवन जीने का सच्चा मार्ग सिखाती है।“हक पराया नानका, उस सूअर उस गाय।गुरु पीर हामा ता भरे, जा मुरदार न खाय।।”(अर्थ : गुरु नानक जी कहते हैं कि किसी दूसरे के हक की कमाई को छीनना, धोखा देना या किसी की मजबूरी का गलत फायदा उठाना मुसलमान के लिए सूअर का मांस खाने के समान और हिंदू के लिए गाय का मांस खाने के समान घोर पाप है। आपके गुरु, पीर या पैगंबर ईश्वर के दरबार में आपकी ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 26
संत श्रीसाईं बाबा की यह वाणी किसी भी जीव की भूख को शांत करने और अपनी क्षमता के अनुसार करने का सच्चा मार्ग समझाती है।“जो भूखा है उसे पहले भोजन दो, फिर मुझे भोग लगाओ।यदि तुम किसी जरूरतमंद को दुत्कारते हो, तो तुम मुझे दुत्कारते हो।”साईं बाबा कहते हैं कि यदि तुम्हारे द्वार पर कोई भूखा या लाचार व्यक्ति आता है, तो मंदिर में आकर मेरी मूर्ति के आगे छप्पन भोग लगाने से पहले उस भूखे इंसान का पेट भरो। यदि तुम अपने जीवन में किसी गरीब या असहाय जीव का अनादर करते हो या उसे अपने दरवाजे से ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 27
“ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।अनेन वेद्यं सच्छास्त्रं, इति वेदान्त डिण्डिमः॥”“केवल ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या जीव भी ब्रह्म से भिन्न नहीं है, जीव ही ब्रह्म है। यही सच्चे शास्त्रों का सार है, यही वेदान्त की घोषणा है।”गहरे अर्थ की व्याख्यायह वेदान्त का महावाक्य है। इसे समझने में अक्सर भ्रम हो जाता है। ‘मिथ्या’ का अर्थ ‘झूठ’ नहीं है। ‘मिथ्या’ का अर्थ है — ‘जैसा दिखता है, वैसा न होना।’जैसे रस्सी को अंधेरे में देखकर सर्प समझ लिया जाए। सर्प वहां है नहीं, पर दिख रहा है। यह सर्प ‘मिथ्या’ है। प्रकाश आते ही सर्प गायब ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 28
संत गुरु अर्जुन देव जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के लालच और दिखावे को छोड़कर निष्काम भाव कर्म करने का सच्चा मार्ग दिखाती है।“सेवा करत होइ निहकामी।तिस कउ होत परापति सुआमी।।”हिंदी अर्थ : जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ, लालच या फल की इच्छा के समाज और जीवों की सेवा करता है, केवल उसी पवित्र इंसान को साक्षात परमात्मा की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सफल हो जाता है।अक्सर लोग इस कसौटी को सुनकर सोचते हैं कि क्या अपने परिवार के लिए कमाना या अपनी सुख-सुविधाओं के लिए इच्छा रखना गलत बात है? लेकिन गुरु अर्जुन देव ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 29
भारत के महाराष्ट्र के चौदहवीं शताब्दी के परम सिद्ध, विद्रोही और वारकरी संप्रदाय के महान संत चोखामेला जी की अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रसिद्ध अमृत वाणी (अभंग) यहाँ दी गई है। यह वाणी समाज में किसी व्यक्ति की जाति, रंग या बाहरी रूप को न देखकर उसके भीतर छिपी आत्मा और प्रेम की शुद्धता को पहचानना सिखाती है।संत चोखामेला जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के सामाजिक ऊंच-नीच के पाखंड को तोड़कर भीतर के सच्चे भाव से जीवन जीने का मार्ग दिखाती है।“ऊस डोंगा परी रस नव्हे डोंगा।काय भुललासी वरलीया रंगा॥चोखा डोंगा परी भाव नव्हे डोंगा।”अभंग का हिंदी अर्थ ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 30
भारत के कश्मीर प्रांत की चौदहवीं शताब्दी की परम सिद्ध योगिनी और रहस्यवादी संत लल्लेश्वरी जी (जिन्हें कश्मीरी भाषा लाल द्यद या लल्ला भी कहा जाता है) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और अद्भुत अमृत वाणी (वाख) यहाँ दी गई है। उनकी काव्य-शैली को ‘वाख’ कहा जाता है। यह वाणी हमारे जीवन में संतुलन (Balance) और समभाव रखने का असली रास्ता दिखाती है।“खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,न खाकर बनेगा अहंकारी।सम खा तभी होगा समभावी,खुलेगी साँकल बंद द्वार की।।”हिंदी अर्थ : यदि तुम केवल संसार के भोगों और सुख-सुविधाओं में डूबे रहोगे, तो जीवन में कभी भी आत्मज्ञान या सच्ची शांति नहीं ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 31
संत बुल्ले शाह जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के बाहरी दिखावे और किताबी ज्ञान के घमंड को दिल की सफाई और खुदा (परमात्मा) के प्रति सच्चे प्रेम का मार्ग दिखाती है।“पढ़ पढ़ इल्म हजार किताबें, कदी अपने आप नूं पढ़िया नईं।जा जा वड़दे मंदिर मसीती, कदी मन अपने विच वड़िया नईं।ऐवें लड़दा एं रोज शैतान दे नांल, कदी नफ्स अपने नांल लड़िया नईं।बुल्ले शाह असमानी उड्डियां फड़दा एं, जेड़ा घर बैठा ओहनूं फड़िया नईं।।”दोहे का हिंदी अर्थ : तुमने हजारों किताबें और ग्रंथ पढ़ लिए और बहुत सारा ज्ञान (इल्म) इकट्ठा कर लिया, लेकिन कभी अपने खुद ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 32
भारत के महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के एक और परम सिद्ध, निश्छल और विट्ठल भगवान के अनन्य भक्त संत कुम्हार जी (संत गोरोबा) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और मर्मस्पर्शी अमृत वाणी यहाँ दी गई है। यह वाणी किसी भी मनुष्य की योग्यता को केवल उसके बाहरी दावों से न परखकर, जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपे हुए उसके आचरण और चरित्र से पहचानना सिखाती है।संत गोरा कुम्हार जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के खोखलेपन और पाखंड को छोड़कर, सत्य की कसौटी पर कसकर जीवन को प्रामाणिक बनाने का मार्ग दिखाती है।“मुंग्यांनी खाल्ला डोंगर, नाथांनी केला अंगीकार।कोण ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 33
गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गाँव के परम सिद्ध, त्यागी और साक्षात् अन्नपूर्णा के परम भक्त संत जलाराम की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रसिद्ध अमृत वाणी यहाँ दी गई है। यह वाणी जीवन में केवल धन इकट्ठा करने की होड़ को छोड़कर, भूखे को अन्न खिलाने और निस्वार्थ सेवा करने का असली आध्यात्मिक रहस्य सिखाती है।संत जलाराम बापा की यह वाणी किसी भी प्रकार के कंजूसी और संचय के अहंकार को तोड़कर, परोपकार के सच्चे मार्ग पर चलना सिखाती है।“देने को टुकड़ा भला, लेने को हरि नाम।जलाराम इस संसार में, यही तुम्हारा काम।।”संत जलाराम बापा कहते हैं कि ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 34
“रे बंदे तू काहे के तोत दिवाना।काल अचाका पकरिहै तोहीं, जैहैं प्रान पराना॥”संत धरणीदास जी जीव को सचेत करते कहते हैं कि हे मनुष्य! तू व्यर्थ ही सांसारिक मोह-माया, धन-दौलत और अभिमान में अंधा (दीवाना) होकर क्यों भटक रहा है? याद रख, काल (मृत्यु) अचानक आकर तुझे दबोच लेगा और पल भर में तेरे प्राण इस शरीर को छोड़कर उड़ जाएँगेगहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्यासंत धरणीदास जी जब कहते हैं “काल अचाका पकरिहै तोहीं”, तो उनका संकेत केवल भौतिक मृत्यु की ओर नहीं है। ‘काल’ का अर्थ समय भी है। समय अचानक बीत जाता है और हमारे हाथ से ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 35
“भीखा बात अगम की, कहन सुनन की नाहिं।जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाहिं॥”संत भीखा साहब कहते कि वह परम सत्य (परमात्मा का अनुभव) अत्यंत अगम्य और गहरा है, वह केवल मुँह से कहने या कानों से सुनने की वस्तु नहीं है। जिसे वास्तव में उस दिव्य आनंद का अनुभव हो जाता है, वह मौन हो जाता है। इसके विपरीत, जो केवल ऊपरी दावों और अहंकार के जरिए बड़ी-बड़ी बातें करता है, वास्तव में उसने उस सत्य को जाना ही नहीं है।गहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्याइस वाणी में भीखा साहब आध्यात्मिक अनुभव की ‘अनिर्वचनीयता’ (जिसे शब्दों में ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 36
मक्खी बैठे शहद पर, पंख रहे लपटाए।रज्जब विकल होय धुने सिर, हाथ मले पछताए॥संत रज्जब जी समझाते हैं कि प्रकार एक छोटी सी मक्खी मीठे शहद के लालच में आकर उस पर बैठ तो जाती है, लेकिन उसका लालच इतना बढ़ जाता है कि वह उसमें पूरी तरह डूब जाती है और उसके पंख उसी शहद में लथपथ होकर चिपक जाते हैं। अंत में वह मक्खी चाहकर भी उड़ नहीं पाती और तड़प-तड़प कर, अपना सिर धुनकर और हाथ मलकर केवल पछतावे के साथ अपने प्राण गंवा देती है; ठीक वैसी ही दशा इस संसारी जीव की है जो ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 37
“संसार की चिंता छोड़ो और यह खोजो कि यह चिंता करने वाला ‘मैं’ कौन हूँ? जब तक अहंकार जीवित तब तक प्रश्न और समस्याएँ रहेंगी। अहंकार के विलीन होते ही केवल अनंत शांति शेष रह जाती है।”आधुनिक युग के महान संत महर्षि रमण का यह उपदेश सुनने में बहुत सरल लगता है, लेकिन इसे समझने में लोग अक्सर बड़ी भूल कर बैठते हैं। लोग सोचते हैं कि यदि मैं संसार की चिंता करना ही छोड़ दूँगा, तो मेरे बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाई और घर के खर्चों का क्या होगा? क्या संत हमें पूरी तरह स्वार्थी और उदासीन ...Read More
अमृत वाणी - संत वाणी - 38
“दादू इस संसार में, दोई रत्न अमोल।एक साईं एक संत है, जे कोई जानै तोल॥”गहरे अर्थ की व्याख्यासंत दादू जी इस साखी में जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति की पहचान करवा रहे हैं। वे कहते हैं कि इस पूरी सृष्टि में केवल दो ही रत्न ऐसे हैं जो वास्तव में अनमोल हैं, जिनका कोई मोल नहीं लगाया जा सकता। पहला रत्न स्वयं ‘साईं’(परमात्मा/ईश्वर) है, और दूसरा रत्न ‘संत’ (वह गुरु या श्रेष्ठ पुरुष जो सत्य का मार्ग दिखाता है)। जो व्यक्ति इन दोनों के आध्यात्मिक महत्व और मूल्य को समझ लेता है (जे कोई जानै तोल), उसका जीवन पूरी ...Read More