“रे बंदे तू काहे के तोत दिवाना।
काल अचाका पकरिहै तोहीं, जैहैं प्रान पराना॥”
संत धरणीदास जी जीव को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य! तू व्यर्थ ही सांसारिक मोह-माया, धन-दौलत और अभिमान में अंधा (दीवाना) होकर क्यों भटक रहा है? याद रख, काल (मृत्यु) अचानक आकर तुझे दबोच लेगा और पल भर में तेरे प्राण इस शरीर को छोड़कर उड़ जाएँगे
गहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्या
संत धरणीदास जी जब कहते हैं “काल अचाका पकरिहै तोहीं”, तो उनका संकेत केवल भौतिक मृत्यु की ओर नहीं है। ‘काल’ का अर्थ समय भी है। समय अचानक बीत जाता है और हमारे हाथ से अवसर निकल जाते हैं। मनुष्य अक्सर सोचता है कि अभी तो कमाने की उम्र है, अभी तो संसार भोगने की उम्र है, जब बुढ़ापा आएगा तब शांत बैठेंगे, तब अच्छे काम करेंगे या भगवान का नाम लेंगे।
धरणीदास जी इसी भ्रम पर चोट करते हैं। वे समझाते हैं कि जीवन की यह मोह-माया एक ऐसी भूलभुलैया है जो इंसान को कभी फुर्सत नहीं देती। ‘प्रान पराना’ होने का अर्थ है कि जब चेतना इस शरीर को छोड़ती है, तब मनुष्य के मन में केवल पछतावा रह जाता है कि उसने वह काम तो किया ही नहीं जिसके लिए उसे यह जीवन मिला था। यह वाणी हमें ‘प्रोक्रैस्टिनेशन’ (काम को कल पर टालने की आदत) से मुक्त होकर आज और अभी जागने की प्रेरणा देती है।
व्यावहारिक उदाहरण
आज के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और भौतिकवादी युग में यह वाणी तीन रूपों में हमारे सामने एक आईना रखती है :
• करियर और महत्वाकांक्षा का संतुलन : आज का युवा कॉर्पोरेट की सीढ़ियाँ चढ़ने या व्यापार को बढ़ाने की अंधी दौड़ (चकाचौंध) में इतना दीवाना है कि वह अपने माता-पिता, जीवनसाथी और बच्चों तक के लिए समय नहीं निकाल पाता। वह सोचता है कि एक बार सेटल हो जाऊँ, फिर सबको समय दूँगा। लेकिन समय अचानक बीत जाता है, बच्चे बड़े हो जाते हैं, माता-पिता साथ छोड़ देते हैं। यह वाणी याद दिलाती है कि भविष्य के किसी अज्ञात सुख के लिए अपने ‘आज’ के रिश्तों और शांति की बलि न चढ़ाएं।
• स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति की अनदेखी : लोग धन कमाने के चक्कर में अपने शरीर और मानसिक स्वास्थ्य की परवाह नहीं करते। रात-रात भर जागना, तनाव पालना और गलत जीवनशैली अपनाना—यह सब इसी दीवानेपन का हिस्सा है। अचानक जब कोई गंभीर बीमारी (जैसे साइलेंट हार्ट अटैक या क्रोनिक स्ट्रेस) घेरती है, तब समझ आता है कि कमाया हुआ धन भी शरीर को वापस ठीक नहीं कर सकता।
• सोशल मीडिया की झूठी दुनिया : आज लोग इंटरनेट पर लाइक्स, फॉलोअर्स और अपनी झूठी प्रतिष्ठा (स्टेटस) के दीवाने हैं। वे स्क्रीन पर एक आभासी (virtual) जिंदगी जी रहे हैं जो पूरी तरह नश्वर और खोखली है।
धरणीदास जी कहते हैं कि इस झूठी दुनिया की दीवानगी से बाहर निकलो और वास्तविक जीवन के मूल्यों को पहचानो।
विरोधाभास का समाधान
इस वाणी को सुनकर यह विरोधाभास आ सकता है कि यदि सब कुछ क्षणभंगुर है और मृत्यु निश्चित है, तो फिर जीवन में कोई योजना (Planning) या लक्ष्य (Goal) क्यों बनाना? क्या इससे व्यक्ति अकर्मण्य या निराशावादी नहीं हो जाएगा?
संत धरणीदास जी हमें निराशावादी नहीं, बल्कि यथार्थवादी बना रहे हैं। योजना बनाना गलत नहीं है, लेकिन उस योजना के पीछे यह अहंकार होना गलत है कि “मैं अमर हूँ और सब कुछ मेरे नियंत्रण में है।” जब आप जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार कर लेते हैं, तो आपका हर कार्य कृतज्ञता (Gratitude) से भर जाता है। आप हर दिन को ईश्वर का उपहार मानकर जीते हैं। आप काम तो पूरी लगन से करते हैं, लेकिन उसके परिणाम से खुद को इतना नहीं बांधते कि परिणाम खराब होने पर आप टूट जाएं। यही इस विरोधाभास का सुंदर समाधान है।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ आज में जीने की कला : अच्छे कार्यों, धर्म, परोपकार और अपनों के साथ प्रेम बाँटने के काम को कभी कल पर मत टालिए। जो करना है, आज और अभी करें।
★ मोह और कर्तव्य में अंतर : संसार की चीजों से प्यार (मोह) करने के बजाय उनका उपयोग केवल अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाने के लिए करें।
★ अहंकार का विसर्जन : पद, प्रतिष्ठा या धन का घमंड कभी न करें, क्योंकि काल के सामने राजा और रंक दोनों बराबर हो जाते हैं।
★ प्राथमिकता का निर्धारण : चौबीस घंटों में से कुछ समय एकांत, आत्म-चिंतन और उस परम सत्ता के आभार के लिए जरूर निकालें।
आज की पावन प्रार्थना
“हे दयानिधान प्रभु! मुझे इस संसार के झूठे आकर्षणों और अहंकार के अंधेपन से बचाए रखना। मुझे यह विवेक दें कि मैं अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी आपके सत्य मार्ग और परोपकार को कभी न भूलूँ। इस नश्वर शरीर के रहते मैं कुछ ऐसा सार्थक कर सकूं जो मेरी आत्मा का कल्याण करे। 🙏”