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काश मेरे पापा विचित्र होते
वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानीराम बहादुर रेलवे अस्पताल में कंपाउंडर थे। डोरिये की कमीज़, ख़ाकी नेकर और पैरों में हुई चप्पलें- यही उनकी पहचान थी। अस्पताल में डॉक्टरों का अलग रुतबा था। मरीजों के साथ आए लोग भी उन्हें आदर से घेर लेते, जबकि राम बहादुर को अक्सर कोई मामूली कर्मचारी समझ कर आवाज़ लगा देता। डॉक्टरों की यह प्रतिष्ठा देखकर उनके मन में एक ही इच्छा जन्म लेती थी- " काश उनका बेटा डॉक्टर बन जाए!"एक सौ बीस रुपए मासिक वेतन में पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे का ख़र्च चलाना आसान नहीं था। बच्चों ...Read More