वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
राम बहादुर रेलवे अस्पताल में कंपाउंडर थे। डोरिये की कमीज़, ख़ाकी नेकर और पैरों में घिसी हुई चप्पलें- यही उनकी पहचान थी। अस्पताल में डॉक्टरों का अलग रुतबा था। मरीजों के साथ आए लोग भी उन्हें आदर से घेर लेते, जबकि राम बहादुर को अक्सर कोई मामूली कर्मचारी समझ कर आवाज़ लगा देता। डॉक्टरों की यह प्रतिष्ठा देखकर उनके मन में एक ही इच्छा जन्म लेती थी- " काश उनका बेटा डॉक्टर बन जाए!"
एक सौ बीस रुपए मासिक वेतन में पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे का ख़र्च चलाना आसान नहीं था। बच्चों की पढ़ाई, घर की ज़रूरतें और बेटियो की शादी के लिए थोड़ी-सी बचत भी उसी छोटी सी तनख़्वाह में करनी थी। इसीलिए उन्होंने एक निजी डॉक्टर के क्लीनिक पर भी पार्ट टाइम कंपाउंडर की नौकरी कर ली थी। गनीमत थी कि पुश्तैनी मकान था।
उस रात वह रोज़ की अपेक्षा कुछ ज़्यादा देर से घर लौटे।
उन्होंने अपने बिस्तरे का अंदाज़ लगाने के लिए पल भर को बिजली जलाई। पत्नी नींद में ही बड़बड़ाई, "आ गए?" और करवट बदलकर सो गई।
लेट जाने पर राम बहादुर को एक बड़ी डकार आती मालूम पड़ी, लेकिन उन्होंने डकार नहीं ली। उन्हें लगा कि ऐसा करने से उस चुप्पी में ख़लन पड़ जाएगा, जो चारों तरफ भरी है, और काफी रात गए ऐसा होना उचित नहीं है।
तभी मकान के पिछवाड़े से रेल गाड़ी धड़धड़ाती हुई गुज़र गई। थोड़ी देर तक एक साफ भागता हुआ शोर होता रहा। सर्दियों में जब यह गाड़ी गुज़रती है तब लोग एक प्रहर की ख़ासी नींद ले चुके होते हैं। गर्मियों में साढ़े बारह का कोई विशेष मतलब नहीं होता। यों उनके घर में सभी जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने के आदि थे। लेकिन आज उमस इतनी थी कि रास्ते भर उन्हें जितने लोग मिले, उन सब ने उनसे गर्म और बेचैन कर देने वाले मौसम की ही बात की। कपड़े शरीर से चिपक रहे थे। और थकान अलग परेशान कर रही थी। अभी जब रेल गाड़ी शोर करती हुई गुज़री, तो उन्हें ऐसा नहीं लगा कि नींद लगते-लगते टूट गई हो जैसा जाड़ों में प्राय: लगता है। बल्कि यू लगा कि अगर सोने की चेष्टा शुरू नहीं की गई तो सचमुच देर हो जाएगी। उन्होने जम्हाई ली तभी बिल्ली ने रोना शुरू कर दिया।
मकान की छत पर एक छोटी सी कोठरी थी। उसमें उनका बेटा योगेश पीएमटी की तैयारी में देर रात तक पढ़ता रहता था। बीएससी करने के बाद उसने पीएमटी के कई अटेंप्ट किए लेकिन सिलेक्शन नहीं हुआ था।
राम बहादुर चारपाई पर करवट बदलते हुए उठे। पहले उन्होंने बिल्ली को डांट कर भागने की कोशिश की। जब वह कुछ देर चुप रहने की बात फिर रोने लगी तो उन्होंने डंडा उठाया और उसे भगाने के लिए इस दिशा में दौड़े जिधर से आवाज आ रही थी। साथ ही हट्ट -हट्ट चिल्लाते रहे।।
योगेश ने अपने कमरे से यह सब देखा। वह समझ गया कि पिता को लगा होगा, बिल्ली की रुलाई से बेटे की पढ़ाई मैं व्यवधान पड़ रहा है। उसे अपने ऊपर ग्लानि हुई। वह सोचने लगा, पिता दिन भर अस्पताल में काम करते हैं, शाम को पार्ट टाइम क्लीनिक जाते हैं। रात में लौट कर भी चैन से नहीं सो पाते। ऊपर से मेरी पढ़ाई के लिए अपनी नींद तक क़ुर्बान कर रहे हैं। आख़िर कब तक?
उस रात उसने तय कर लिया कि अब पीएमटी का मोह त्याग कर कोई नौकरी कर लेगा।अगले दिन वह विनोद से मिला। वह उसका पड़ोसी और सहपाठी भी था। बीएससी के बाद एक केमिकल फैक्ट्री में प्लांट ऑपरेटर की नौकरी कर रहा था।
योगेश ने उसे अपना बायोडाटा दिया और नौकरी लगवाने का अनुरोध किया। विनोद ने अपने बॉस से सिफारिश करके उसका इंटरव्यू करवा दिया। योगेश का शेक्षणिक रिकॉर्ड अच्छा था। कुछ ही दिनों में उसे नियुक्ति पत्र मिल गया।
घर आकर उसने खुशी-खुशी पिता को नियुक्ति पत्र दिखाया।
राम बहादुर ने उसे ध्यान से पढ़ा। फिर बोले, "बेटा, अभी मैं कमा रहा हूं। तुम हिम्मत क्यों हार रहे हो?" डॉक्टर बनने का सपना तुमने ही नहीं, मैंने भी देखा है। नौकरी की जल्दी मत करो। मेहनत जारी रखो। मुझे पूरा विश्वास है, एक दिन तुम्हारा चयन ज़रूर होगा।"
योगेश ने कहा, "लेकिन पिताजी, आपकी भी तो उम्र हो रही है।"
वह मुस्कराए, "मेरी चिंता छोड़ो। अभी तुम्हारी उम्र पढ़ने की है।"
पिता के शब्दों ने योगेश में नई ऊर्जा भर दी। उसने नौकरी का विचार छोड़ दिया और फिर से तैयारी में जुट गया। इस बार उसकी मेहनत रंग लाई। पीएमटी में उसका चयन हो गया।
राम बहादुर की खुशी का ठिकाना नहीं था। जिस बेटे को डॉक्टर बनने के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं को वर्षों तक दबाए रखा था, उनका सपना आख़िर पूरा होने जा रहा था।
कई वर्षों की आर्थिक तंगी और कठिनाइयों के बाद योगेश डॉक्टर बनकर लौटा। उसकी शादी अपनी सहपाठी अंजलि से हो गई। दोनों को शहर के सरकारी अस्पताल में नौकरी मिल गई। योगेश को अस्पताल परिसर में एक बंगला आवंटित हुआ। इसी बीच राम बहादुर भी रेलवे अस्पताल से सेवा निवृत हो गए। अब वे पत्नी के साथ बेटे के बंगले में रहने लगे।
कुछ समय बाद योगेश को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। घर में नामकरण संस्कार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर उसने अपने मित्र विनोद को भी आमंत्रित किया था। पार्टी में सीएमओ साहब सहित कई डॉक्टर और प्रतिष्ठित लोग मौजूद थे।
विनोद ने देखा कि राम बहादुर अपने बेटे की पुरानी पतलून और जर्सी पहने, हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए मेहमानों की प्लेटों में एक-एक पीस रख रहे थे। उन्हें शायद डर था कि मिठाई मेज़ पर रख दी गई तो कोई एक से अधिक पीस न उठा ले। उनकी इस हरकत को देखकर कुछ महिलाएं एक- दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थीं।
विनोद ने योगेश से धीरे से पूछा, "अंकल अभी भी ऐसे ही रहते हैं?"
योगेश हंस पड़ा, "तुम नहीं जानते, मेरे पिताजी बंड़े विचित्र हैं।"
पार्टी ख़त्म होने के बाद दोनों मित्र एकांत में बैठकर बातें करने लगे। योगेश ने अपने पिता के बारे में कुछ और बातें बताई। "पिछली सर्दियों में अंजलि उनके लिए कोट का कपड़ा लाई थी। पहले तो वह उसे लेने को तैयार नहीं हुए, लेकिन मां के काफी घुड़कने-फुड़कने से राज़ी हो गए। पुराने शहर के किसी लपटूं मूल्ला दर्ज़ी के यहां सिलवाने चल दिए। अंजलि ने कहा, "कपड़ा क़ीमती है, चलिए, एक अच्छी जगह आपका नाप दिलवा दूं। वह ठीक सिएगा। मेरा परिचित भी है।"
इस बात पर पिता ने काफी हिक़ारत दिखाई। चिढ़कर बोले, "मैं सबको जानता हूं, वे दर्ज़ियों वाली गली के छोटे-मोटे दर्ज़ियों से काम कराते और अपना लेबल लगा देते हैं। मुल्ला टेलर के दादा से अंग्रेज कपड़े सिलवाते थे। यह फैशन- वैशन, उनके आगे कुछ नहीं है। मुझे व्यर्थ पैसा नहीं ख़र्च करना है। पैसा पेड़ पर नहीं उगता है।
देखा तुमने, कितना विरोधाभासी तर्क दिया उन्होंने। ऐसा वह अपनी ज़िद को सर्वोपरि रखने के लिए किया करते हैं। आखिर अंजलि ने कपड़ा छोड़ दिया। वह बोली- " जहां चाहिए पापा जी वहां सिलवाइए।" वह कपड़ा आज भी पिता के टीन के बक्से में रखा हुआ है। सिलवाने की नौबत ही नहीं आई।"
योगेश कुछ देर रुका, फिर बोला, "और तो और, एक दिन सुबह-सुबह अम्मा ने बताया की पिताजी रात में ही उठकर बगीचे में चले गए थे। शायद कोई आम गिरने की आवाज़ सुन ली थी। पीठ पर पसीने से बनियान चिपकी हुई थी, फिर भी आम तलाशने पहुंच गए। पता नहीं, उन्हें गिरे हुए आम की इतनी चिंता क्यों रहती है।"
वह हंसते हुए बोला, " लंबे समय से वह दो ही किताबें पढ़ते आ रहे हैं-अखंड रामायण और गीता। मैं तो हैरान हूं कि कोई आदमी ज़िंदगी के इतने साल से दो किताबों के सहारे कैसे गुज़ार सकता है!"
विनोद चुपचाप सुनता रहा। फिर अचानक उसकी आवाज़ भर्रा गई। "योगेश, तुम्हारे पिता सचमुच विचित्र हैं।"
योगेश ने मुस्कुराकर कहा, "मैं तो हमेशा से यही कहता हूं।"
विनोद की आंखें नम हो गई। वह बोला, "शायद मेरे पिता की आर्थिक स्थिति तुम्हारे पिता से कहीं बेहतर थी। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। उन्होंने कभी पैसे की तंगी नहीं देखी लेकिन मुझे बीएससी करने के बाद सीधे इस केमिकल फैक्ट्री में प्लांट ऑपरेटर बनवा दिया।"
वह कुछ पल रुका। फिर बोला, "तुम्हें पता है, मेरी नाइट शिफ्ट कैसे गुज़रती है?" फैक्ट्री में एसिड के बड़े-बड़े टैंक हैं। रात में अनगिनत सीढ़ियां चढ़कर उनकी डिप चेक करनी पड़ती है। कभी-कभी एसिड की तेज़ गंध और ख़तरनाक माहौल में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। जाड़ों की रातों में भी डर के मारे पसीना छूटने लगता है।"
उसने गहरी सांस ली। उसकी आंखों से दो बूंद आंसू टपके। धीरे से कहा- "काश मेरे पापा विचित्र होते।" और वहां से उठकर चला गया।
एक रात योगेश को पिताजी के कमरे से कुछ आहट सुनाई दी। उसने सोचा, शायद बगीचे में आम गिरा होगा और वे उसे उठाने गए होंगे। वह निश्चिंत होकर सोता रहा।
सुबह उठा तो कमरे में न पिताजी थे न उनका टीन का बक्सा। मेज़ पर कोट का वही कपड़ा रखा था जो अंजलि उनके लिए ख़रीद कर लाई थी। उसके नीचे एक छोटी सी पर्ची मिली जिस पर लिखा था- "मैं कुछ दिनों के लिए अपने पुराने शहर जा रहा हूं, वहां मेरा एक पुराना मकान है, कुछ पुराने दोस्त हैं और कुछ पुरानी यादें भी। मेरी चिंता मत करना। ज़िंदगी के बहुत से दिन दूसरों की इच्छाओं के अनुसार जी लिए। अब कुछ दिन अपनी मर्जी से जीना चाहता हूं। मेरी एक इच्छा है-मेरी अर्थी वहीं से उठे, जहां मेरा जन्म हुआ था। आशा करता हूं तुम इसमें बाधा नहीं बनोगे।"
पर्ची पढ़कर योगेश सन्न रह गया।
राम बहादुर पुराने घर पहुंचे। ताला खोला तो देखा, घर कबाड़खाना बन चुका था। उन्होंने फर्श पर टीन का बक्सा रखा और एक पलंग पर अपने लेटने की व्यवस्था की।
सवेरा हो चुका था। शौच जाने के लिए पानी की ज़रूरत पड़ी। घर में हैंडपंप लगा हुआ था। वर्षों से न चलने के कारण उसका पानी उतर चुका था। वह हैंडपंप चलाने लगे।
विनोद का घर राम बहादुर के घर से सटा हुआ था। हैंड पंप चलने की आवाज सुनकर वह घर में आया। अंकल को हैंडपंप चलाते देखकर चौंक गया। वह बुरी तरह हांफ रहे थे। विनोद कुछ समझ पाता या कह पता उससे पहले ही राम बहादुर गिर पड़े। उनकी सांसे उखड़ने लगीं और फिर थम गईं।
पड़ोसी जमा हो गए थे। कोई योगेश को पिता के स्वर्गवास की सूचना देने सरकारी अस्पताल गया। उसके आने से पहले ही अर्थी उठ चुकी थी।
योगेश शमशान घाट पहुंचा। उसने देखा कि विनोद उसके पिता की चिता को अग्नि दे रहा था।
दाह संस्कार में पड़ोस में रहने वाले मास्टर साहब भी मौजूद थे। योगेश ने उनसे पूछा-"पिताजी को क्या हुआ था?"
उन्होंने कहा, "बेटा, जब तुम पिताजी की उम्र तक पहुंचोगे, तब इसका उत्तर स्वयं मिल जाएगा।"
योगेश ने व्याकुल होकर कहा- "प्लीज यह तो बताइए... मेरा जुर्म क्या है जो हर कोई मुझसे ऐसी बातें कर रहा है?"
मास्टर साहब कुछ क्षण मौन रहे फिर धीरे से बोले, "वही जुर्म जो औलाद सदियों से करती आई है और करती रहेगी। यू समझो, पुरानी शराब को नई बोतल में भरकर रखने का जुर्म। तुमने अपने पिता को अपने नए संसार में जगह तो दी, लेकिन उनके पुराने ढंग, उनकी छोटी-छोटी इच्छाओंं और उनकी आज़ादी के लिए जगह नहीं बना पाए।"
यह सुनकर योगेश की आंखें भर आईं। उसने कहा, "मास्टर साहब,आप ठीक कहते हैं।"
फिर वह विनोद के गले लग गया और रूंधे गले से बोला- "मेरे भाई, तुमने मुझे आगाह किया था। काश मैं सचेत हो जाता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।"
उसकी आंखों से आंसू टपक पड़े।
348 ए, फाइक एंक्लेव, फेस 2, पीलीभीत बायपास, बरेली (उ प्र) 243006, मो: 90 27982074 ईमेल wajidhusain963@gmail.com