Anokhi Dulhan - 36 in Hindi Love Stories by Veena books and stories PDF | अनोखी दुल्हन - ( एक घर ऐसा भी_३) 36

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अनोखी दुल्हन - ( एक घर ऐसा भी_३) 36

" तुम्हारा नाम क्या है ?" ए वहीं सवाल है, जिसके बाद यमदूत ने वहा रुकना जरूरी नहीं समझा। रुक कर करता भी क्या ? यमदूत बनने के बाद उन्हें एक नंबर मिला था, कोई नाम नही। कोई सरनेम नही। सिर्फ एक नंबर। और अगर वीर प्रताप की माने तो यमदूत बनना ही उसके बुरे कर्मों की सजा है। सनी के पूछे उस सवाल के बाद वह किसी काम का बहाना दे वहां से निकल आया था। सनी हमेशा उसे एक नई उलझन में डाल देती है। पर फिर भी उसे उससे मिलना है। मिलना तो पड़ेगा ही यही उनकी किस्मत है।

दूसरी तरफ मॉल में,

" ओ मिस्टर वीर प्रताप को स्मार्ट फोन यूज़ करना भी आता है।" वीर प्रताप सामान की भरी हुई ट्रॉली खींच रहा था और जुही उसके आसपास चल रही थी।

" ऐसा कोई काम नही जो मैं नहीं कर सकता।" वीर प्रताप ने अपनी गर्दन ऊंची करते हुए कहा।

" तभी मैं सोचूं मुझे यह प्राइवेट नंबर से कॉल कौन कर रहा है। अच्छा बताओ मुझे यहां क्यों बुलाया और यह सामान हम क्यों ले रहे हैं?" जूही ने पूछा।

" मुझे मेरे कमरे का इंटीरियल बदलना है। तो सोचा क्यों ना कुछ नए जमाने का अरेंज किया जाए और तुम जैसे बच्चों से ज्यादा किसे पता होगा कि क्या क्या सामान लेते हैं। इसलिए तुम्हें बुलाया अब चुपचाप यहां रहो और मेरी मदद करो।" वीर प्रताप।

" अच्छा मुझे लगा आप मेरे कमरे के लिए शॉपिंग कर रहे हैं।" जूही ने उदास होने का नाटक किया।

" नहीं मैं मेरे कमरे के लिए कर रहा हूं।" वीर प्रताप।

" तो तुम क्या उस टैडी को लेकर सोने वाले हो।" जूही ने उसका मजाक बनाने के हिसाब से पूछा।

" हां सोऊंगा तुमसे मतलब ?" वीर प्रताप का जवाब भी तैयार था।

" मुझे भी एक टेडी चाहिए ?" जूही ने ट्रॉली में एक सॉफ्ट टॉय डालते हुए कहा।

" नहीं मिलेगा।" वीर प्रताप ने उस खिलौने को वापस उसकी जगह रख दिया।

एक दूसरे से बहस कर आखिरकार दोनों की शॉपिंग खत्म हुई। जैसे ही दोनों घर पहुंचे वीर प्रताप ने सारा सामान जूही को दे दिया।

" सब मेरे लिए ?" जूही ने उत्साहित होते हुए पूछा।

" हां नहीं तो तुम्हें क्या लगा। मैं सच में भालू के साथ सोऊंगा।" वीर प्रताप ने उसका मजाक बनाते हुए पूछा।

जूही ने उसके हाथ से सारा सामान लिया। "तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया। मैं इस भालू का नाम वीर रखूंगी। क्योंकि तुमने इसे मुझे लाकर दिया है ना।" वीर प्रताप फिर से पलट कर कुछ जवाब दे पाए। उससे पहले वह सामान लेकर अपने कमरे भाग गई।

वीर प्रताप का दिया हुआ सामान उसने अपने पसंद के हिसाब से अपने कमरे में सजाया। दूसरे दिन सुबह जब वह यमदूत से मिली। यमदूत उदास होकर सोफे पर बैठा था।
" गुड मॉर्निंग " जूही उसके सामने बैठी।

" इस मॉर्निंग में गुड होने जैसी कोई बात नहीं है।" यमदूत ने उसे जवाब दिया और वो फिर अपने ख्यालों में चला गया।

" तुम परेशान हो क्या? मतलब मुझे कोई इंटरेस्ट नहीं है तुम्हारी बात जानने में। लेकिन फिर भी क्योंकि हम लोग एक ही घर में रह रहे हैं। तो अगर तुम चाहो तो मुझसे शेयर कर सकते हो।" जूही ने उसकी परेशानी भांपते हुए कहा।

यमदूत ने एक नजर फिर से जुही को देखा। " किसी ने मुझसे मेरा नाम पूछा है ?"

" तो इसमें परेशानी क्या है ?" जूही ने पूछा।

" मेरा कोई नाम नहीं है। होगा तो भी मुझे याद नहीं। बताओ मैं क्या जवाब दूं ?" यमदूत।

" ओ। तुम्हें पता है मिस्टर गोब्लिन का भी एक नाम है ?" जूही ने धीरे से कहा।

" सच में क्या है ?" यमदूत में आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।

" वीर प्रताप सिंग। कुल ना ?" जूही।

" हां काफी अच्छा है।" यमदूत।

" तुमभी अपना अच्छा सा कोई नाम रख क्यों नहीं लेते ?" जूही।

" क्या रखूं ?" यमदूत।

" तुम ने कुछ सोचा क्या ?" जूही ने पूछा।

" हां मैंने कुछ तो सोचा है। प्रेम, कबीर या रणबीर।" यमदूत।

" नहीं। इनमें से कोई भी नहीं। यह सारे फिल्मी किरदारों के नाम है। कुछ अलग सोचो। लड़कियों को अलग और गहराई भरे नाम वाले लोग ज्यादा पसंद आते हैं।" जूही ने इतना कहा और वो स्कूल के लिए निकल गई।

शाम को जब राज उसे लेने आया, उसने सारी बातें राज को बताई।

" बस यही बाकी था अब। मेरे घर में तुम्हारी कीमत मुझसे ज्यादा है।" राज ने परेशान होते हुए कहा।

" मतलब तुम्हें ऐसा क्यों लगता है ?" जूही ने पूछा।

" और नहीं तो क्या ? मेरे अंकल जो मुझे एक-एक पैसा भी गिनके देते हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए खुद जाकर शॉपिंग की। तुम्हें उस घर में रहने की परमिशन दे रहे हैं। जब कि मुझे उनकी इजाजत के बगैर आने-जाने से तक मना किया गया है। मैं इकलौता वारिस हूं उनका लेकिन मुझे इजाजत नहीं है। और वह टेनंट अंकल । वह तो मुझसे कभी बात भी नहीं करते। हमेशा धमकियां देते रहते हैं। अब तुमसे परेशानी शेयर कर रहे हैं। और तो और आज सुबह ही दादाजी ने मुझे बताया कि तुम्हारे हाथों में कोई बहुत जरूरी चीज है। जिसके लिए मुझे तुम्हारा ख्याल रखना पड़ेगा।" इतना कह राज फिर से गाड़ी चलाने पर ध्यान देने लगा।

" मेरे हाथों में कोई जरूरी चीज। जैसे क्या ?" जूही ने अचंभित होते हुए पूछा।

" मेरा क्रेडिट कार्ड।" राज।

" वाउ। मुझे हमेशा लगता था कि मेरे पास कुछ नहीं है लेकिन आज देखो मेरे हाथों में काफी जरूरी चीज है और मुझे ही पता नहीं। मेरा रेस्टोरेंट आगया गाड़ी यही रोक दो।" जूही ने राज से कहा।

राज ने सामने वाली बिल्डिंग को देखा। "कौन सा वाला ?"

" वह । वह वही जो कॉर्नर में है ना। चिकन रेस्टोरेंट।" इतना के जूही उतर कर चली गई।

" अब इसे भी वही काम करना था। जिस रेस्टोरेंट को मैं बेचना चाहता हूं।" राज ने एक लंबी सांस ली।