O Bedardya - 12 in Hindi Love Stories by Saroj Verma books and stories PDF | ओ...बेदर्दया--भाग(१२)

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ओ...बेदर्दया--भाग(१२)

शक्तिमोहन अपने लफंगे दोस्तों के साथ ठेके पर दारू पीता रहा और दोपहर तक घर ना पहुँचा,वहाँ शैलजा दोपहर के खाने पर उसका इन्तजार करती रही,शैलजा ने सोचा कि शक्ति शाम तक लौट आएगा इसलिए उसने शास्त्री जी और अभ्युदय को खाना खिलाकर खुद भी खा लिया,फिर शाम होने को आई लेकिन शक्तिमोहन घर ना लौटा,आधी रात गए वो शराब के नशे में धुत घर लौटा,उसकी हालत देखकर शैलजा और शास्त्री जी परेशान हो उठे,शक्ति ऐसी हालत में भी नहीं था कि उससे बात की जा सके,वो लड़खड़ाता हुआ अपने कमरें जाकर बिस्तर पर लेट गया,इसलिए उस रात अभ्युदय के कमरें में शास्त्री जी लेटे....
सुबह हुई तो इस विषय पर शैलजा ने शास्त्री जी से बात करते हुए कहा....
"आपने कल शक्ति की हालत देखी"
"हाँ!उसी के बारें में तो मैं भी सोच रहा था",शास्त्री जी बोले...
"अब सोचने का वक्त नहीं है,कुछ करने का वक्त है",शैलजा बोला...
"उसे केवल समझाया जा सकता है,अपनी औलाद होती तो सख्ती से पेश आते,अगर हमने सख्ती दिखाई तो समाज तो यही कहेगा ना कि चचेरे भाई का लड़का था इसलिए उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं और शक्ति भी हमें गलत समझने लगे तो तब क्या होगा?"शास्त्री जी बोले....
"इसलिए तो मैं कह रही थी कि ब्याह कर दो उसका",शैलजा बोली....
"लेकिन बड़े भाई का ब्याह अभी नहीं हुआ तो इसका कैसे कर दें?"शास्त्री जी बोले...
"मुझे डर है कि बात कहीं हाथ से ना निकल जाएं,शक्ति बरबादी की राह पर तो चल ही पड़ा है और अगर इससे भी ज्यादा वो कुछ और कर बैठा तो हम दोनो स्वयं को कभी माँफ नहीं कर पाऐगें"शैलजा बोली...
"तो तुम ऐसा करो एक बार अभ्युदय से और पूछ लो कि वो ब्याह के लिए राजी है या नहीं,अगर राजी हो जाता है तो उसके स्वस्थ होते ही हम उसका ब्याह कर देते हैं,फिर इसके बाद शक्ति का ब्याह भी कर देगें और अगर अभ्युदय राजी नहीं भी होता तो तुम शक्ति के लिए लड़की देखना शुरू कर दो,जब गृहस्थी की बेड़ियाँ पैरों में पड़ जाएगीं तो अपने आप सुधर जाएगा",शास्त्री जी बोले...
"हाँ!सही कहा आपने,मैं कल ही अभ्युदय से इस बारें में बात करती हूँ,अगर वो मान जाता है तो मैं फौरन ही उसके लिए लड़की देखना शुरू कर देती हूँ",शैलजा बोली...
फिर दूसरे दिन शैलजा ने इस विषय पर अभ्युदय से पूछा तो वो बोला....
"माँ!मैं अभी शादी नहीं करना चाहता,मुझे अभी बहुत से काम करने बाकी हैं,तुम ऐसा करो पहले शक्ति का ब्याह कर दो,मैं अभी अपने काम पर ध्यान देना चाहता हूँ,काँलेज के छात्रों के लिए बहुत सी सुविधाएंँ मुहैया करवानी है,जिसके लिए मुझे विधायक जी की मदद की जरूरत भी पड़ेगी ,यदि मेरा ध्यान काम पर रहा तो फिर मैं तुम्हारी बहू को समय नहीं दे पाऊँगा तो फिर तुम्हें और तुम्हारी बहू को भी मुझसे शिकायत रहेगी,इससे बेहतर है कि मैं अभी कुछ दिनों तक ब्याह ही ना करूँ",अभ्युदय बोला....
"जैसी तेरी मर्जी !तो फिर मैं शक्ति के लिए ही लड़की ढूढ़ना शुरु करती हूँ,"शैलजा बोली..
"हाँ! माँ यही ठीक रहेगा",अभ्युदय बोला...
फिर क्या था सबकी रजामंदी पर शैलजा ने शक्ति के लिए लड़की ढ़ूढ़नी शुरु कर दी और फिर एक उच्च घराने की सुन्दर और सुशील कन्या शैलजा को मिल ही गई,लड़की के पिता बैंक में कैशियर थे,उनका नाम कृष्णगोपाल शास्त्री था,माँ घरेलू महिला थी और लड़की अपने माँ बाप की इकलौती सन्तान थी,लड़की पढ़ी लिखी भी थी और हमेशा अव्वल आती थी,कृष्णगोपाल जी के और कोई सन्तान तो थी नहीं इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को बड़े दुलार से रखा और उसकी हर ख्वाहिश पूरी की और वो यही चाहते थे कि उनकी बेटी को ससुराल भी ऐसी ही मिले,जहाँ के सदस्य खुले विचारों वाले हों और उन्होंने जब शास्त्री जी और शैलजा के व्यवहार के बारें में सुना तो उन्होंने फौरन ही लड़का देखने उनके घर आने के लिए हाँ कर दी,कृष्णगोपाल जी अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ शक्ति को देखने आएं और शास्त्री जी ने शक्ति के बारें में उन्हें सब बता दिया कि वो मेरे चचेरे भाई का सगा लड़का नहीं है और गाँव में लल्लन की जितनी जमीन-जायदाद और मकान है वो सब शक्ति का ही है,उसमें हमारा कोई भी हिस्सा नहीं है ,तब कृष्णगोपाल जी बोले....
"जो माँ बाप गोद लिए बेटे को इतने प्यार से रख सकता है तो उस घर में तो प्यार ही प्यार बरसता होगा,मुझे लगता है कि इससे ज्यादा अच्छा घर और वर मेरी बेटी को नहीं मिल सकता,मुझे ये रिश्ता मंजूर है,आप सभी एक बार लड़की की देख लें तो बात आगें बढ़ाई जाएं"
"आपको हमारा बेटा पसंद आया ,ये तो बड़ी अच्छी बात है,अब हम सब भी लड़की देख लें तो थोड़ी तसल्ली हो जाए,हम सबका लड़की देखना उतना जरूरी नहीं है लेकिन लड़का लड़की एक बार एक दूसरे को देखकर पसंद कर लें तो फिर सगाई कर देते हैं",शास्त्री जी बोलें...
"जी!बहुत बढ़िया!मैं भी यही चाहता हूँ"कृष्णगोपाल जी बोले....
"जी!भाईसाहब! हम सभी जल्द ही आपके घर आते हैं,शैलजा बोली...
"जी!बहनजी!मुझे आप सबकी प्रतीक्षा रहेगी",कृष्णगोपाल जी बोले..
और फिर सभी लड़की देखने गए,लड़की नाश्ता लेकर बाहर आई,शर्म से उसकी पलकें झुकी हुई थी,खुले और लम्बे बाल,गोरा रंग ,कद काठी की भी अच्छी थी और उसने साड़ी पहन रख थी,लड़की ने टेबल पर नाश्ता रखा तो शैलजा बोली...
"बैठो बेटा!"
शैलजा के कहने पर लड़की उन सभी के सामने वाले सोफे पर बैठ गई तब शैलजा ने उसका नाम पूछा तो लड़की बोली...
"जी!दुर्गा"
तब शैलजा ने पूछा....
"नाम तो बहुत अच्छा है,हमने सुना है कि तुम पढ़ने लिखने में बहुत होशियार हो और क्या क्या रूचियाँ हैं तुम्हारी"?
"जी!मुझे खाना पकाना पसंद है ,गीत गाना पसंद है,लेकिन सिलाई बुनाई का मुझे कोई शौक नहीं है",दुर्गा बोली...
"ईमानदार भी हो,सब सच सच कहती हो",शैलजा बोली...
"जी!मुझे किसी को धोखा देना पसंद नहीं है इसलिए अपने बारें में मैनें आपको सब सच सच बता दिया",दुर्गा बोली...
"इनसे मिलों ये है हमारा बड़ा बेटा अभ्युदय और ये छोटा शक्ति,ये हैं शास्त्री जी और मुझे देखकर तो तुम समझ ही गई होगी कि मैं कौन हूँ?"शैलजा सबका परिचय करवाते हुए बोली...
और फिर शक्ति और दुर्गा को थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से बात करने के लिए छोड़ दिया गया,वें दोनों उधर बातें कर रहे थे और इधर ये सब बातें कर रहे थे और फिर लड़का लड़की ने एक दूसरे को पसंद कर लिया और रिश्ता पक्का हो गया...

क्रमशः....
सरोज वर्मा...