Dwaraavati - 11 in Hindi Fiction Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | द्वारावती - 11

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द्वारावती - 11

11

व्यतीत होते समय के साथ घड़ी में शंखनाद होता रहा ….

नौ, दस, ग्यारह, बारह…..

एक, दो, तीन, चार…..

चार शंखनाद की ध्वनि ने गुल को जागृत कर दिया। वह किसी समाधि सेजागी, उठी। उसकी दृष्टि उत्सव पर पड़ी। वह भी वहीं बैठा था, रात्रि भर, निश्चल, स्थिर। वह भी जैसे किसी समाधि में था।

उत्सव की स्थिति में कोई भी व्यवधान डाले बिना ही गुल वहाँ से उठी, नित्य कर्म करने लगी, समुद्र में स्नान आदि कर्म कर लौट आइ।

उत्सव अभी भी वहीं था, किंतु निंद्राधिन था। जब वह जागा तब सूरजअपनी यात्रा के कई पड़ाव पार कर चुका था।

“गुल, कहाँ हो तुम?”

उत्सव के सामने स्मित के साथ गुल प्रकट हुई। वही भुवन मोहिनी स्मितको देखकर उत्सव के सभी शब्द, सभी भाव मौन हो गए। वह बस उसस्मित को देखता रहा, अनुभव करता रहा, कृष्ण के सन्मुख होने की प्रतीतिकरता रहा।

“तुम चाहो तो थोड़ा अधिक विश्राम कर सकते हो।”

“मन को यह विश्राम भाने लगा है। किंतु क्या मैं यहाँ विश्राम करने के हेतुसे आया हूँ? मेरा प्रयोजन, मेरा लक्ष्य विश्राम तो नहीं है, पंडित जी।”

“कदापि नहीं। विश्राम कभी भी किसी का लक्ष्य नहीं हो सकता। तुम्हाराभी नहीं।”

“तो मैं बार बार क्यूँ इन सांसारिक प्रक्रियाओं में उलझ जाता हूँ?”

“उत्सव, तुम्हारा संकेत किस तरफ़ है?”

“यह भोजन लेना, निंद्रा करना, तृषित होना, यह, यह सब…।”

“यह कोई सांसारिक बातें नहीं है, अपितु यह तो जैविक क्रियाएँ है। तुमइन बातों से विचलित क्यूँ हो जाते हो?”

“यही सब बातें मुझे मेरे मार्ग से भटका देती है, मुझे मेरे विश्वास सेविचलित कर देती है। क्या यह मोह है? माया है?”

“नहीं, यह भी एक गति ही है।”

“इस प्रकार रुक जाना, ठहर जाना, गति कैसे हो सकती है?”

“कभी कभी कुछ भी ना करना भी एक प्रकार से गति ही होती है।”

“वह कैस, गुल?”

“जब हम आवश्यकता से अधिक सक्रिय होते हैं, गतिमान होते हैं तब यहीगति हमारे मार्ग की बाधाएँ बन जाती है। यह हमें विध विध मार्ग के प्रतिआकृष्ट करती है, अनेक लक्ष्य का प्रलोभन देती है और हम निश्चय हीनहीं कर पाते की हमें क्या करना है? कौन से मार्ग को पसंद करना है? कौनसे लक्ष्य को प्राप्त करना है?”

“यह अनुभव मुझे भी तो हुआ है। तो क्या हमें रुक जाना चाहिए?”

“अवश्य।”

“उससे क्या होगा? हम लक्ष्य से कहीं दूर नहीं हो जाएँगे क्या? हाथ से वहछूट नहीं जाएगा?”

“भटकाने से भी क्या होगा? वह भी तो हमें लक्ष्य से दूर ही कर देता है।”

“किंतु गति तो बनी रहती है, लक्ष्य प्राप्ति की अपेक्षा भी तो बनी रहती हैना?”

“वह गति नहीं है।”

“तो क्या है? तो क्या करना होगा हमें?”

“यदि गति उचित दिशा में हो तो ही उसे गति कहते है। विपरीत दिशा मेंचलने से तो गति नहीं बनती। ऐसे में कुछ समय तक हमें स्थिर हो जानाहोगा। मन के भीतर चल रहे अनेक उत्पातों को शांत करना होगा, आवेगोंका शमन करना होगा। समय के एक बिंदु पर सब कुछ छोड़ देना होगा।सब कुछ भूलना होगा। क्या तुम यह सब कर सकोगे?”

“यदि मेरे लक्ष्य के लिए यह उचित है तो मुझे यह स्वीकार्य है। किंतु उससेक्या होगा?”

“तब तुम शून्य से प्रारम्भ कर सकोगे।”

“किंतु अब तक जो मैंने किय उसका क्या?”

“उन सब को सामने दिख रहे समुद्र में बहा दो।”

“क्या? सब कुछ बहा दुं? क्यूँ?”

“क्या किया है तुमने अब तक? क्या प्राप्त किया है अब तक?”

“ऋषियों से, ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त किया है। जीवन के अनेक अनुभवों कोपाया है। भूख, तृषा, बिंद्रा आदि से मुक्ति पाई है। संसार का त्याग करनासिखा है।”

“यह सब तो तुमने अवश्य ही पाया है, उत्सव। किंतु आवश्यकता सेअधिक प्रत्येक बात बाधा बन जाती है। ज्ञान, अनुभव आदि प्राप्त करने मेंतुम ने कोई संयम रखा था क्या?”

“इसमें संयम कैसा? वह जितना अधिक मिले, उतना ही लाभप्रद होता है।”

“नहीं, यह अधिकता ही हानिप्रद होती है। तुम्हें इनको त्यागना होगा।”

“जो अधिक है उसका त्याग करने को मैं तैयार हूँ।”

“ठीक है, तो उसका त्याग करो। यह समुद्र तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।”

“मैं जाता हूँ समुद्र के पास। मैं अभी लौट आता हूँ, अधिकता का त्यागकर।”

“किंतु….।” गुल ने कुछ कहना चाहा किंतु उत्सव ने नहीं सुना, वह चलपड़ा समुद्र की तरफ़। गुल उसे जाते हुए देखती रही।

समय के एक अंतराल के पस्चात उत्सव लौट आया। गुल ने स्मित के साथअभिवादन किया।

“बहा आए समुद्र में?”

“हाँ।” उत्सव ने मंद स्वर में कहा।

“कुछ खोने की पीड़ा तुम्हारे शब्दों से प्रकट हो रही है। क्या तुम्हे …?”

“कुछ नहीं, मैं सब कुछ छोड़ कर आया हूँ। सब कुछ। कुछ भी नहीं बचामेरे पास।”

“किंतु तुम तो …।”

“मैं तो गया ही था मेरे पास जो अधिक था उसका त्याग करने, किंतु मैं सबकुछ त्याग आया।”

“ऐसा क्यूँ किया?”

“यहाँ से उठकर मैं समुद्र के पास गया, उसके तट पर बैठ गया। सोचनेलगा कि मेरे पास क्या क्या अधिक है? एक एक कर सब सीखी हुई बातोंको याद करने लगा। उसका विश्लेषण करने लगा। मैं स्वयं से पूछता गयाकि क्या यह अधिक है? क्या यह त्यागने के योग्य है? क्या यह मेरे मार्ग कीबाधा है? क्या यह मेरे लक्ष्य के लिए उपयुक्त है? यदि यह हो तो क्याहोगा? यदि यह नहीं हो तो क्या होगा?”

बोलते बोलते उत्सव रुक गया।समुद्र की लहरों को दिखने लगा। लहरेंतीव्र हो गई थी, जैसे उत्सव की बातें सुनने के लिए उत्सुक हो, उत्साहितहो। गुल ने भी समुद्र को देखा। उसे भी यह रूप अनूठा लगा। गुल भी तोउत्सुक थी, उत्साहित थी उत्सव की बात सुनने के लिए। गुल के मन कीतरंगें तथा समुद्र की तरंगें एक समान हो गई।

“उत्सव, आगे कहो।”

“फिर एक एक करते हुए सभी बातें, सभी ज्ञान, सभी अनुभव मैंने समुद्र कोसमर्पित कर दिए। मेरे पास अब कुछ शेष नहीं है।”

“अर्थात् तुम रिक्त हो चुके हो!”

“मेरे भीतर कुछ भी शेष नहीं है, मैं पूर्ण रूप से रिक्त हो चुका हूँ। मेरा भीतररिक्त हो गया।”

“उत्सव, यह एक विशिष्ट अवस्था है। भीतर से रिक्त होने के पस्चात क्याअनुभव कर रहे हो?”

“जैसे मन से तथा तन से कोई भार दूर हो गया हो। जैसे मैं कोई पंखी हूँ , मेरे दोनों तरफ़ पंख लगे हो तथा मैं मुक्त गगन में उड़ने को तैयार हूँ।असीम आकाश की सम्भावनाएँ मेरी प्रतीक्षा कर रही हो। मन करता है किइस गगन को मैं मेरे पंख के भीतर भर लूँ, उड़ जाऊँ कहीं दूर दूर, और इससमुद्र को ऊपर से निहार लूँ। तट पर रहकर तो समुद्र को सदैव निहारते रहाहूँ, किंतु उसे ऊपर से निहारने का अनुभव करना चाहता हूँ।”

“तो तुम पंखी बनकर कहीं दूर उड़ना चाहते हो? तो उड़ा जाओ, किसकीप्रतीक्षा कर रहे हो?”

“यह अवस्था मुझे गति दे रही है। यदि यही मेरी गति होगी, यही मेरीनियति होगी तो मैं शीघ्र ही उड़ जाऊँगा।”

उत्सव ने गुल के मुख के भावों को देखा। वह कुछ असाधारण से थे। उत्सवउसे पढ़ नहीं सका।

उत्सव से दृष्टि मिलते ही गुल जागृत हो गई, स्वयं के भावों को समेटा, साधारण होने की चेष्टा करने लगी। समुद्र की तरफ़ मूडी, आँखें बांध करदी।

“उत्सव, तुम्हारी यह अवस्था विशिष्ट है। इस अवस्था को प्राप्त करने केलिए ही ऋषि, मुनि, योगी आदि युगों से प्रयास करते आ रहे हैं। मुझेसंज्ञान नहीं कि इस प्रयास में कौन कितना सफल रहा। तुम साधुवाद केपात्र हो कि तुमने उसे प्राप्त कर लिया है।”

“मेरे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कदाचित यही उचित होगा।”

“उत्सव, समुद्र तथा उस पर स्थित असीम गगन तुम्हारे पंखों का आवाहनकर रहे है, तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे है।”

“उचित समय की मुझे प्रतीक्षा है। किंतु मैं लौट कर यहीं वापस आऊँगा।मेरे प्रश्नों के समाधान मिलने से पहले मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”

उत्सव के इन शब्दों ने गुल के मन के भावों को बदल दिया। उसे उत्सव सेछुपाते हुए वह घर के भीतर चली गई। उत्सव उन भावों से अनभिज्ञ रहा।

उत्सव तट पर गया, अविरत उठती तरंगों के सम्मुख बैठ गया। वह पूर्णत: शांत था। उसके मन में कोई तरंग नहीं थे। व्यतीत होते समय से वहअलिप्त था। वह ना भूत काल में था ना भविष्य काल में, ना प्रश्नों में था नाउत्तरों में था। वह निर्भय था, मुक्त था।

वह केवल समुद्र के सम्मुख था, उठती तरंगों की ध्वनि को सुन रहा था। वहध्वनि उसे परिचित लगी, मधुर लगी, कर्ण प्रिय लगी। किसी भी गति सेमुक्त वह उस ध्वनि को सुनता रहा। वह प्रसन्न था।