कमरा अँधेरा था।
नील की पीठ नरम सतह से लगी हुई थी।
बिस्तर।
या शायद कुछ और—उसे फ़र्क़ नहीं पड़ा।
पास एक देह थी।
गरम।
जीवित।
उसकी साँसें नील की साँसों से टकरा रही थीं—तेज़, अनियंत्रित।
युवती का चेहरा नक़ाब में ढँका था, और शरीर एक हल्की चादर में लिपटा।
उसकी उँगलियाँ नील की कलाई पर आईं।
खींचा नहीं—
बस थाम लिया।
“थक गए हो,”
उसने कहा।
आवाज़ मीठी थी।
बहुत मीठी।
उसने नील को अपनी ओर खिसका लिया।
कोई विरोध नहीं।
कोई सवाल नहीं।
फिर युवती ने चादर नीचे खिसकाई।
“पी लो, नील,”
उसने कहा।
“सुकून है।
ताक़त है।
सब कुछ भूल जाओगे।”
नील ने झिझक महसूस नहीं की।
उसने आगे बढ़कर स्वाद लिया।
पहले—गरम।
मीठा।
जैसे भीतर कोई भूख तृप्त हो गई हो।
फिर—कड़वाहट।
तेज़।
धातु-सी।
उसका गला जलने लगा।
मुँह में अजीब-सा हरा स्वाद भर गया।
नील ने पीछे हटना चाहा—पर शरीर ने साथ नहीं दिया।
युवती मुस्कराई।
“अब देखो,”
उसने कहा।
नील ने काँपते हाथों से नक़ाब पकड़ा।
धीरे-धीरे ऊपर उठाया—
–
इंद्राणी।
–
कमरा जैसे सिकुड़ गया।
इंद्राणी उसके सामने खड़ी थी—बिना शर्म।
बिना अपराध-बोध।
वही परिचित मुस्कान।
ठंडी।
ज़हरीली।
“मैंने कभी कहा था ये अमृत है?”
उसने धीमे पूछा।
“तुमने खुद मान लिया।”
नील ने अपने होंठ पोंछे।
उँगलियाँ हरी थीं।
तरल उसकी हथेली से टपक रहा था।
ज़हर।
इंद्राणी पीछे हट गई।
कमरा डोलने लगा।
बिस्तर जैसे दलदल बन गया।
–
नील झटके से उठ बैठा।
सीना ज़ोर-ज़ोर से चल रहा था।
मुँह में अब भी वही कड़वा स्वाद।
बारिश की आवाज़ लौट आई थी।
वह सपना था।
पर इच्छा—
वह नहीं थी।
यह चाह नहीं थी।
यह विश्वास का विष था।
जिसे उसने कभी अपना समझा—वही उसे अंदर से डस चुका था।
सपना टूट चुका था और नील का शरीर जाग गया था,
पर दिमाग़ पहले से तेज़ दौड़ रहा था।
सुबह।
किराए के कमरे की खिड़की खुली थी।
बारिश थम चुकी थी।
नील शीशे के सामने खड़ा था—
नज़रें थकी हुईं,
पर भीतर कहीं आग जल चुकी थी।
वह किचन में गया।
ब्लेंडर की तेज़ आवाज़।
प्रोटीन शेक।
केला।
सेब।
मुट्ठी भर ड्राय फ्रूट।
नील ने बिना चेहरे बनाए सब पी लिया।
थोड़ी देर बाद—
एक सस्ता जिम।
दीवारों पर उखड़ा पेंट।
पुराने पोस्टर—No Pain No Gain।
नील ट्रेडमिल पर।
पसीना टपकता हुआ।
साँसें गहरी।
वह दर्द को गिनता नहीं था—
बस आगे बढ़ता जाता था।
फिर—
पुश-अप्स।
प्लैंक।
ग्रिप ट्रेनर।
उसी शाम—
नील दौड़ रहा था।
सड़क पर।
गलियों में।
फ्लाईओवर के नीचे।
लोग देखते थे।
कुछ हँसते।
कुछ अनदेखा कर देते।
नील आखिर रुक गया।
हाँफता हुआ।
जहाँ कभी घंटों दौड़ लेता था,
अब कुछ ही मिनटों में साँस फूल गई थी।
–
उसी समय, कुछ किलोमीटर दूर—
प्रतुल का घर।
वीडियो कॉल।
स्क्रीन पर जिगरा।
चेहरा शांत, आँखें थकी हुई।
दूसरी तरफ़ प्रतुल।
कमरा अँधेरा।
टेबल पर व्हिस्की।
“जिगरा,”
उसने कहा,
“बस एक दिन के लिए टाल दे शादी।”
जिगरा चुप रही।
प्रतुल की आवाज़ भारी हो गई।
“तीन फरवरी, छह बजे मेरा एंकल मॉनिटर हटेगा।
मैं सात बजे तक वडोदरा कैसे पहुँचूँगा, यार?”
जिगरा की आँखें नीचे झुकीं।
फिर बोली—
“देखो प्रतुल… कुंदन भैया ने बड़े राज-ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवाया है।”
एक पल रुकी।
“मांगलिक दोष है या कुछ और—इस तारीख़ के बाद दो साल तक कोई मुहूर्त नहीं।”
प्रतुल ने आँखें बंद कर लीं।
दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।
कॉल खत्म।
कमरे में सन्नाटा।
–
दूर मुंबई के एक मैटरनिटी हॉस्पिटल में
NICU के बाहर की रोशनी सफ़ेद थी—बिल्कुल भावहीन।
काँच की दीवार के उस पार, एक नन्ही-सी देह मशीनों से घिरी पड़ी थी।
तार।
ट्यूब।
मॉनिटर की धीमी बीप।
हर बीप के साथ दामिनी की साँस भी गिनती में चल रही थी।
उसकी बच्ची—
प्रीमैच्योर।
नाज़ुक।
पर ज़िद्दी।
जैसे साँस लेना भी एक लड़ाई हो।
पीछे से कदमों की आहट आई।
विश्वजीत सोलंकी पास आकर रुके।
बिना कुछ कहे, उन्होंने अपनी हथेली दामिनी के सिर पर रख दी।
वह स्पर्श भारी था।
सुरक्षित।
“तेरी बच्ची,” उन्होंने धीमे कहा, “तेरी ही तरह है, बेटा। ताक़तवर। दुनिया से लड़ने वाली।”
दामिनी की पलकें काँपीं।
एक आँसू चुपचाप गिरा।
उसने तुरंत पोंछ लिया—जैसे किसी गवाह की ज़रूरत न हो।
“सब ठीक होगा,”
विश्वजीत ने कहा।
–
उसी शाम शहर से बाहर की कोठी बहुत शांत थी, शायद भयावह भी।
इतनी शांत कि अपने ही क़दमों की आवाज़ अजीब लगने लगी।
दामिनी चुपचाप टैक्सी से उतरी।
हाथ में पर्स कसकर दबाए हुए।
अपने पिता को बिना बताए आई थी।
"क्या मैं सही करने जा रही हूँ?"
"सुनीता भी तो जाती है इन तांत्रिक बाबा के पास…"
टैक्सी चली गई।
निर्णय साफ़ हो गया—अब अंदर जाना ही था।
उसने बेल बजाई।
अंदर एक महिला अटेंडेंट ने बिना सवाल पूछे रास्ता दिखाया।
एक बड़े दरवाज़े के पास आकर वह रुक गई और उँगलियों से इशारा किया।
दामिनी ने पर्स खोला।
पचास हज़ार रुपये।
रसीद नहीं माँगी।
अंदर का कमरा बड़ा था।
पत्थर का।
बीच में एक स्नान-कक्ष, जहाँ से भाप उठ रही थी।
दूर एक युवा तांत्रिक बैठा था।
हरे वस्त्र।
चेहरा शांत।
आँखें—बहुत ज़्यादा स्थिर।
पास छह स्त्रियाँ खड़ी थीं।
न कोई रो रही थी।
न कोई हँस रही थी।
सब जैसे पहले से तय निर्णय लेकर आई हों।
“अनुष्ठान से पहले शुद्धि आवश्यक है,”
तांत्रिक ने कहा।
“सारे वस्त्र एक ओर रख दीजिए।”
एक-एक करके स्त्रियाँ आगे बढ़ीं।
उनके कपड़े ज़मीन पर रखे जाने लगे।
ऊपर से गर्म पानी के झरने गिरने लगे।
भाप और गाढ़ी हो गई।
दामिनी रुकी रही।
तांत्रिक उठकर सामने आया।
“कोई समस्या, देवी?”
दामिनी चुप रही।
“यदि आप नहीं चाहतीं,” उसने सहज स्वर में कहा, “तो जा सकती हैं। पैसा भी वापस हो जाएगा।”
दामिनी ने गहरी साँस ली।
मेरी बच्ची के लिए।
वह आगे बढ़ी।
कुछ ही क्षणों में वह झरनों के नीचे खड़ी थी—अपने हाथों से खुद को समेटे हुए।
उसके लिए शरीर कोई रहस्य नहीं था, वही था जिसने उसकी बच्ची को जन्म दिया था।
“सब बहनें मेरी ओर मुड़ें,” तांत्रिक ने कहा।
सबने वैसा ही किया।
“हाथ सिर पर रखें।”
दामिनी को हल्की झिझक हुई—पर उसने भी वही किया।
झरनों का पानी रुक गया।
तांत्रिक आगे बढ़ा।
पहली स्त्री के पास गया।
माथे पर भभूत लगाई—फिर नीचे।
“जाओ। काले वस्त्र पहन लो। तुम तैयार हो।”
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
अब दामिनी को कुछ अजीब लगने लगा।
पानी नहीं बदला था।
हवा नहीं बदली थी।
एक हरकत बदली थी।
उसकी रीढ़ में ठंड दौड़ गई।
यह असहजता निर्वस्त्र होने से नहीं थी—बल्कि उस स्पर्श की आशंका से थी।
उसे नील याद आ गया।
उसका कोमल स्पर्श—प्रेम, सम्मान और सहमति से भरा हुआ।
यहाँ वैसा नहीं था।
तांत्रिक दामिनी के सामने रुका।
उसने उसके माथे पर भभूत लगाई।
फिर हाथ नीचे बढ़ा—
दामिनी ने कलाई पकड़ ली।
“नहीं।”
बस एक शब्द। पर पूरा।
तांत्रिक का चेहरा तमतमा गया।
“निकल यहाँ से,” वह झुंझलाया। “पागल औरत। मेरा वक़्त बर्बाद मत कर।”
दामिनी ने एक पल नहीं गंवाया।
अपने कपड़े उठाए और बाहर निकल गई।
–
थोड़ी देर बाद।
टैक्सी की पिछली सीट पर बैठी दामिनी ने आँखें बंद कीं।
पीली स्ट्रीट-लाइट्स तेज़ी से भागती जा रहीं थीं।
“क्या करने जा रही थी मैं…” उसने खुद से कहा। “अब कभी नहीं।”
वह समझ चुकी थी—शरीर देना कभी समस्या नहीं था।
सीमा लाँघना—था।
और वह सीमा आज उसने खुद बचाई थी।