Parde ke puchhe - 5 in Hindi Moral Stories by ARTI MEENA books and stories PDF | पर्दे के पीछे - 5

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पर्दे के पीछे - 5

ट्रेन धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ती रही और कुछ ही घंटों बाद वह उस छोटे से स्टेशन पर आकर रुक गई, जहाँ से मिश्राइन का गाँव अधिक दूर नहीं था।
मिश्राइन और दोनों बच्चियाँ सामान समेटकर नीचे उतरीं। स्टेशन छोटा था, लेकिन वहाँ की हलचल किसी बड़े स्टेशन से कम नहीं थी। इधर-उधर अपने घर जाने की जल्दी में लोग भागते नज़र आ रहे थे।
प्लेटफॉर्म पर ही उनका देवर उन्हें लेने आया हुआ था।
वह गाँव के ही एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक था।
मिश्राइन को देखते ही उसने आगे बढ़कर सामान उठा लिया और मुस्कुराते हुए बोला—
“भाभी, सफर में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
मिश्राइन ने हल्की सी थकान भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“नहीं, बस भीड़ बहुत थी आज ट्रेन में।”
बच्चियाँ गाँव आने की खुशी से इधर-उधर उत्सुक नज़रों से सब कुछ देख रही थीं।
शहर की भागती ज़िंदगी से दूर यह जगह उन्हें हमेशा कुछ अलग ही लगती थी।
थोड़ी ही देर में सब लोग स्टेशन से बाहर निकलकर गाँव की ओर चल पड़े।गाँव…
वह जगह जहाँ आदमी शहर की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी से दूर कुछ सुकून भरे पल बिताने आता है।
गाँव, जहाँ हवा अब भी कुछ हद तक साफ़ है, जहाँ पानी में अब भी मिट्टी की खुशबू मिलती है, और जहाँ सुबह का सूरज किसी अलार्म की आवाज़ से नहीं बल्कि पक्षियों की चहचहाहट से उगता है।
शहर से आने वाले लोगों को गाँव हमेशा शांत और सरल लगता है।
उन्हें लगता है कि यहाँ की ज़िंदगी कितनी सीधी और सुकून भरी है।
लेकिन शायद वही गाँव एक और सच्चाई भी अपने भीतर छुपाए बैठा है।
वही गाँव…
जहाँ आप समाज की उस अदृश्य दीवार को और भी ऊँचा होता हुआ देखते हैं—
वह दीवार जो लोगों के घरों के बीच नहीं,
बल्कि लोगों के मन के बीच खड़ी है।
शहर की भीड़ में यह दीवार कभी-कभी पर्दे के पीछे छुप जाती है,
लेकिन गाँव में वह दीवार अक्सर खुली आँखों से दिखाई देने लगती है।और शायद उस दीवार से अब किसी को कोई खास परेशानी भी नहीं होती।
यहाँ लोग संविधान की बातों से ज़्यादा अपने धर्म और पुरानी परंपराओं की बातों को मानते हुए दिखाई देते हैं।
मिश्राइन जब अपने ससुराल पहुँचीं तो सबसे पहले आँगन में कदम रखते ही उन्होंने अपने सास-ससुर के पैर छुए।
गाँव का वही पुराना घर, वही आँगन, वही लोग—सब कुछ जैसे पहले जैसा ही था।
साथ में वे बच्चों के लिए शहर से कुछ खाने-पीने का सामान भी लाई थीं।
मिठाई, बिस्कुट और कुछ फल।
सास-ससुर के लिए भी वे अपने साथ कुछ चीज़ें लाई थीं, जिन्हें देखते ही बूढ़े सास-ससुर के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
बच्चे तो जैसे शहर से लाई गई उन चीज़ों को देखकर और भी खुश हो उठे थे।
गाँव में शहर से आने वाला हर छोटा-सा सामान भी बच्चों के लिए किसी त्यौहार से कम नहीं होता।
लेकिन इस घर और इस गाँव की हवा में भी वही पुरानी सोच कहीं न कहीं अब भी मौजूद थी—
जिसे शायद कोई बदलना नहीं चाहता था,
या शायद बदलने की हिम्मत ही किसी में नहीं थी।उस दिन सफ़र की थकान के कारण घर में किसी ने ज़्यादा काम नहीं किया।
सबने सोचा कि आज का दिन बस आराम में ही बिताया जाए।
मिश्राइन ने घर में हल्की-फुल्की सफ़ाई करवाई और बच्चों को यह भी बता दिया कि रात को किस कमरे में सोना है।
गाँव का घर बड़ा था, लेकिन हर जगह का अपना एक नियम था—कौन कहाँ सोएगा, किस कमरे में मेहमान रुकेंगे, और किस हिस्से में बुज़ुर्गों का बिस्तर लगेगा।
थोड़ी देर बाद दोनों बच्चियाँ भी तैयार होकर बाहर निकल गईं।
गाँव में उनकी कुछ पुरानी सहेलियाँ थीं, जिनसे मिले हुए उन्हें कई साल हो चुके थे।
शहर की ज़िंदगी में पढ़ाई और स्कूल के बीच इतना समय ही कहाँ मिल पाता था कि वे गाँव आ सकें।
इसलिए जैसे ही मौका मिला, दोनों साइकिल लेकर अपनी सहेलियों से मिलने गाँव की गलियों की ओर निकल पड़ीं।
गाँव की वही पुरानी कच्ची गलियाँ, वही पेड़ों की छाया और वही बचपन की यादें—सब कुछ जैसे उनका इंतज़ार ही कर रहा था।लेकिन अब वह समय नहीं रहा था जब बचपन में छोटे-छोटे पैरों से वे किसी भी घर की दहलीज़ बिना सोचे-समझे पार कर लिया करती थीं।
अब जैसे-जैसे वे बड़ी हो रही थीं, समाज की खड़ी की हुई वे अदृश्य दीवारें उन्हें भी महसूस होने लगी थीं।
जब वे अपनी पुरानी सहेलियों के घर पहुँचीं, तो उन्हें पता चला कि उनमें से अधिकांश की तो शादियाँ हो चुकी थीं।
जो लड़कियाँ कभी उनके साथ कच्ची गलियों में खेला करती थीं, आज वे किसी और घर की बहू बन चुकी थीं।
दोनों बहनें एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी कम उम्र में ही उनकी सहेलियों की ज़िंदगी का रास्ता बदल चुका था।
जिस उम्र में वे अभी भी किताबों और स्कूल की बातों में उलझी हुई थीं, उसी उम्र में उनकी सहेलियाँ अब रसोई, घर-गृहस्थी और नए रिश्तों की ज़िम्मेदारियों में बँध चुकी थीं।
गाँव की हवा भले ही साफ़ थी, लेकिन यहाँ की परंपराएँ अब भी वैसी ही थीं—
जहाँ लड़कियों का बचपन अक्सर बहुत जल्दी ख़त्म हो जाता था।
दोनों बहनों को पहली बार यह महसूस हुआ कि समाज की दीवारें सिर्फ़ जाति की ही नहीं होतीं, कई बार वे उम्र, परंपरा और उम्मीदों से भी बनती हैं।वह गाँव बहुत बड़ा नहीं था, लगभग दो हज़ार लोगों की आबादी वाला एक साधारण सा गाँव।
लेकिन उस छोटे से गाँव में भी समाज की लगभग हर जाति मौजूद थी—पंडित, ठाकुर, माली, चमार, मीणा, महाजन, खाती, लुहार और भी कई छोटे-बड़े समुदाय।
गाँव देखने में भले ही एक था, लेकिन अंदर ही अंदर वह कई हिस्सों में बँटा हुआ था।
कहीं ऊँची चौकियों वाले पक्के घर थे, तो कहीं कच्ची दीवारों और टीन की छतों वाले छोटे-छोटे मकान।
लोग एक ही गाँव में रहते थे, एक ही खेतों की हवा में साँस लेते थे, एक ही कुएँ के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे, क्योंकि उस गांव में सभी के घरों में नल लगे हुएं थे।
फिर भी उनके बीच अदृश्य रेखाएँ खिंची हुई थीं—
ऐसी रेखाएँ, जिन्हें न कोई मिटाने की कोशिश करता था और न ही कोई खुलकर स्वीकार करता था।
शायद यही वह “पर्दा” था, जिसके सामने सब कुछ सामान्य दिखता था,
लेकिन जिसके पीछे समाज की असली तस्वीर छिपी हुई थी।ये रेखाएँ कभी केवल मिट्टी में खिंची हुई थीं, लेकिन समय के साथ वे ऊँची दीवारों में बदल गईं। हर साल गर्मियों में गाँव में देव बाबा का धर्म होता था, जिसके लिए सभी गाँव वाले पैसे देते थे। लेकिन जब प्रसाद बाँटने का समय आता, तो निचली जाति के लोगों की पंगत अलग बिठाई जाती। मानो समाज उस दीवार को और भी ऊँचा करना चाहता हो।बच्चियाँ यह सब सोचती हुई चुपचाप अपने घर लौट आईं। उनके मन में कई सवाल उठ रहे थे—समय इतना जल्दी कैसे बदल गया? बचपन की वह खुली दुनिया कहाँ खो गई, जहाँ न इतनी दीवारें थीं और न ही इतने बंधन।घर में शाम को सबके साथ मिलने-मिलाने का दौर चलता रहा। हँसी-मजाक भी होता रहा। बच्चियाँ अपने दादा-दादी के पास बैठकर उनसे बातें करने लगीं और उन्हें शहर की बातें बताने लगीं। घर का माहौल खुशियों और अपनापन से भरा हुआ था। सभी लोग बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।तभी गाँव के सरकारी डॉक्टर मिश्रा जी के घर आए और बाहर से आवाज लगाई,
“बाबूजी, घर पर हैं क्या?”
दादा जी ने आवाज सुनी और धीरे-धीरे चलते हुए दरवाजे की ओर बढ़े।
दरवाजे पर पहुँचकर उन्होंने पूछा,
“क्या बात है डॉक्टर साहब, इतनी रात को कैसे आना हुआ?”
डॉक्टर ने थोड़ी गंभीर आवाज में कहा,
“बाबूजी, रात को आना जरूरी था, इसलिए चला आया…”