भाग–2
खिड़की के उस पार का मन।
तीनों बच्चे साथ बड़े हो रहे थे,किन्तु उनका बेटा बांस की तरह धड़ाधड़ लंबा होता जा रहा था । परिवार के प्रति बढ़ती जिम्मेदारियों और जरूरतों ने दोनों को गांव छोड़कर शहर में बस जाने पर मजबूर कर दिया।
रुणिया और झुनिया पांच वर्ष की हो गई थीं और रौनक नारायण और नारायणी का बेटा रौनक आठ वर्ष का हो चुका था।
रौनक कक्षा तीन का छात्र था और नारायण ने दोनों बच्चियों का दाखिला भी उसी विद्यालय में करा दिया।
समय बीतता गया , तीनों बच्चे बड़े हो रहे थे गर्मी की छुट्टियों में अक्सर बच्चों को लेकर गांव आना जाना लगा रहता था पर नारायण के परिवार का इस बार का गांव जाना और वहां से लौटना नारायणी को भीतर से कचोट रहा था।
जाने क्यों पर वो घर की दहलीज तक आते आते बेहद असहाय महसूस करने लगी।
भीतर से जैसे कुछ दहक रहा हो, जिसकी महक पूरे सफर में नारायणी के लिए असहनीय रहा।
नारायण के मन में भी कुछ चल रहा था, जिसे नारायणी भांपने की कोशिश करती थी पर हर बार असफल साबित हुई।
नारायण तीनों बच्चों और पत्नी को लेकर दिल्ली पहुंच चुका था।
अब रुणिया झुनिया आठ वर्ष की हो चुकी थी और उनका बेटा ग्यारह वर्ष का।
सावन के महीने में एक ओर भीषण बरसात के कारण दिल्ली जाम..और दूसरी ओर इस बरसात में भी दहक रहा नारायणी का कलेजा,उसके बीपी लो होने का कारण बन गया।
चाय का प्याला नारायण को थमा,वह शाम की खिड़की से सूरज का दीदार करना चाह रही थी लेकिन बारिश के कारण उसे कुछ हाथ न लग सका।
वह खिड़की के पास बैठ किसी गहरे चिंतन में खो गई। पुरानी सड़क बसे किसी पुराने घर से दिखने वाले दृश्य अक्सर धुंधला हो ही जाया करते है।
पेड़ की डालियों से पानी उसके भीतर के सड़न को लेकर बह रहा था।ऊपर आसमान किसी काले धुएं से भरते जा रहा था। सड़क पर गाड़ियों की संख्या कम थी ,बरसात की टिप टिप उसके गालों पर उतरती रहें।सड़क के गड्ढे में धंसे किसी बच्चे के पैर सा उसका कलेजा बैठा जा रहा था।
बारिश ने रफ्तार पकड़ ली,पर इस बार की बारिश घर के उल्टे दिशा में थी।आस पास के छतों पर बच्चे भीग भीग कर नहाने लगे।और दूर से दिखने वाला चौराहा धीरे धीरे धुंध से भर गया ।सावन के महीने में ये धुंध पूस अगहन में छाए हुए कोहरे को भी टक्कर दे रहे थे और इसी घने धुंध में जाता हुआ नारायण धीरे धीरे उसके आंखों से ओझल हो रहा था।
शरीर पर सिहरन बढ़ी तो उसे ख्याल आया,यहां तो कोई नहीं है बस इस धुंध के किनारे किनारे पसरा है एक सन्नाटा।या एक अनकहा गूंज जो अभी अभी दिखा था उसे।नारायणी इस द्वंद्व में थी ही कि,
रौनक मां के गले में हाथ डाल समेट लेता है उसको अपनी बाहों में और झूलने लग जाता है।
किन्तु नारायणी का मन वहीं अटका रहा ,अभी अभी दिखने वाले इस काल्पनिक दृश्य में।
वह रौनक को लाड कर तो रही थी लेकिन खिड़की पर बैठे रहने के बाद भी नारायणी नहीं देख पा रही थी खिड़की के उस पार का मन जहां से हटा सके वह अपने पति के चेहरे पर छाई चुप्पियों को।
धुंध के कारण कुछ भी साफ दिख न सका।
वह अपनी ओर से सारे जतन कर ही रही तो है फिर भी उसका पति गुमसुम रह रहा था।