Shahad ki Gudiya - 43 in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (43)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (43)

               

               शहद की गुड़िया - प्रकरण  43

          "  कुछ भी हो जायें फ्लोरा हर साल दादू को राखी बांधने आती थी और भाऊ बीज के दिन उन्हें अपने घर में बुलाती थी बिल्कुल सुहानी की तरह. "

           " एक बार रक्षाबंधन का त्यौहार था.. हर साल की तरह दादू ने उन्हें घर बूलाया था.. ऊस दिन अंधाधुंध बारिश हो रही थी गाड़िया बंद होने की संभावना थी.. दादू नहीं चाहते थे इन हालात में वह घर आये.. उन्हें रोकने के लिये दादू ने फोन किये थे और बार घंटी बजने की आवाज सुनाई दी रही थी. कोई फोन उठा नहीं रहा था.. और दादू को चिंता होने लगी थी. और ठीक एक घंटे के बाद राघवन अपने बेटे और फ्लोरा को लेकर दादू के कंपाउंड में दाखिल हुआ था.. दोनों का जज़्बा देखकर दादू का दिल पुलकित हो गया था.. उन्होंने ने सवाल किया था. "

             " इतनी भारी बारिश में बच्चे को लेकर जोखिम क्यों उठाया? "

              " ऊस वक़्त राघवन का जवाब सुनकर दादू चकित रह गये थे. "

               "ऐसे अहम त्यौहार में आना निहायत जरूरी हैं, हम उसे कैसे टाल सकते हैं,,?! "

           " यह दिन दादू के लिये यादगार बन गया था.. कीसी का प्यार और ऊस की राखी उन के लिये बहुत ही बड़ा उपहार था. "

             " आरती ने भी भाई बहन के रिश्तों को निभाने में कोई कसर नहीं छोडी थी. "

            " ऊस दिन फ्लोरा ने कहां था : " राघवन मैं अपने भाई के बाजु में बैठकर लंच करूंगी तुम भाभी के पास बैठना! "

             "फ्लोरा ने अपनी बहन का दावा करते हुए यह प्रस्ताव किया था, जिस का सब ने सन्मान किया था. "

              " ऊस दिन काफ़ी बारिश थी इस लिये शाम तक उन को रोके रखा था. बारिश की वजह से सभी को ज्यादा समय साथ रहने का मौका मिला था.. "

              " दादू को सभी धर्मो के प्रति आस्था थी. इस लिये कई बार दोनों के साथ चर्च भी गये थे.. "

            " एक बार राघवन छुट्टी में घर आया था. वह आरती के लिये रिष्ट वॉच लाया था. इतना ही नहीं हर बार की तरह बच्चों के लिये चॉकलेट लाया था..,"

             " राघवन दुबई में रहते हुए भी दादू के संपर्क में रहता था. दादू के परिवार की चिंता करता था.., "

             " दादू ने फ्लोरा की हकालपट्टी को लेकर नाथा लाल के बड़े लडके को मुंह पर सुनाया था. "

             " मुझे कहते हुए दुख होता हैं यहाँ इंसानियत दम तोड़ चुकी हैं. "

              " लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थे. उन को भी कोई बीमारी लग गई था.. उन की आंखे बड़े कौड़े जैसी हो गई थी, मुंह भी फूल गया था. लेकिन सच्चाई उन के गले में नहीं उतरती थी.. "

               " दादू को अपनी प्रतिष्ठा के लिए नाथा लाल को छोड़ना पडा था. लेकिन दादू ने उन्हें फ्लोरा की हकालपट्टी के लिये कभी माफ नहीं किया था. "

              "  ऊस के बाद दादू ने उन के भतीजे के वहाँ भी काम किया था. लेकिन दोनों एक ही बिरादरी से थे तो दादू वहाँ ज्यादा काम नहीं करते पाये थे.. ऊस ओफिस का मुख्य स्टाफ एक हम उम्र लड़का था.. ऊस ने दादू को काम पर रखा था औऱ उसी के वजह से उन्हें जोब छोड़ने की नौबत आई थी. "

               " दो तीन दिन छुट्टी थी. बहुत सारी ओफिस बंद थी ऊस की वजह से 50, 00,000/- के डाक्यूमेंट्स बैंक में जमा करने में दो तीन दिन की देरी हुई थी ऊस पर वह लड़का जिस का नाम भोगेश था वह दादू पर चढ़ बैठा था.."

              " ऊस ने डॉक्यूमेंट्स जमा करने की देरी के लिये दादू को जिम्मेदार ठहराया था. ", 50,00,000/- रूपये के डॉक्यूमेंट्स हैं ऊस में कितना व्याज का नुकसान हुआ मालूम हैं? "

               " सुनकर दादू भड़क गये थे. उन्होंने तुरंत भोगेश को सुनाया था. " 50,00,000/- या पचास करोड़ हो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. औऱ मैं कोई मशीन नहीं हूं.. "

             बातें बढ़ गई थी. ऊस के पीछे ऊस की कोई साजिश काम कर रही थी.. ऊस दौरान दादू की कहानी छपी थी, जिस में दादू ने उन के काले धंधों का हूबहू विवरण किया था. जिसे पढ़कर उन के रोंगटे खडे हो गये थे औऱ उन्होंने ने दादू को दूर करने की कोशिश की थी. बात बढ़ गई थी.. औऱ दादू ने कंपनी के पार्टनर को मुंह पर सुना दिया था."

            " तुम करोड़ पति हो तो तुम्हारे घर के, मेरे लिये तुम्हारी किंमत कौड़ी की भी नहीं. "

             " कंपनी ने ऊस का हिसाब चुकता किया था औऱ दादू ने वह जोब छोड़ दिया था. "

              " ऊस के पहले वह नये शुरू हुए गुजराती दैनिक पेपर में किया था. वहाँ राजहंस नाम का तंत्री जोब छोड़कर एक साप्ताहिक में दादू एडिटर की हैसियत से ज्वाइन हुए थे. ऊस ने अपने हाथ के नीचे दाकाम करने की ओफर की थी. लेकिन वह तो दैनिक पत्र के एडिटर से दो कदम आगे था. "

             " वह जानता था एडिटोरियल में दादू कच्चे थे.. फिर भी सामायिक की सारी जिम्मेदारी दादू के सिर पर पूरा दिन बाहर रहता था. औऱ शुक्रवार सामायिक की डेड लाइन होती थी फिर भी दादू को शुक्रवार की पूरी रात काम करना पड़ता था, कभी सुबह भी हो जाती थी औऱ दादू को भूखा प्यासा काम करना पड़ता था उन को एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती थी. "

             " पानी बहुत बह गया था इस स्थिति में दादू ने उसे साफ कह दिया था. "

            " अब वह ओफिस के मुकरर समय पर काम करेगा. "

             " शनिचर को उन का समय तीन बजे तक था.. फिर भी दादू पांच बजे तक रुके थे. ऊस ने खुद मंजूर किया था. दादू अपना समय होते ही जा सकते हैं. दादू ने फिर भी औपचारिकता निभाते हुए उसे सवाल पूछा था. "

             " मैं जाऊं? " सुनकर राज हंस ने पलटी मारी थी. "

              " अब कुछ हो जायें तो मुझे दोष मत देना! "

              " दादू ने उसे पीछे मूड क़र सवाल किया था?."

              " क़्या होगा? " सवाल पूछकर खुद जवाब दिया था. मुझे जोब से हाथ धोना पड़ेगा वही ना? "

.              "कहकर वह ओफिस की सीढ़ी उतर गये थे. "

                     000000000000   ( क्रमशः)