The Cat Who Turned Into a Human - 15 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | बिल्ली जो इंसान बनती थी - 15

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बिल्ली जो इंसान बनती थी - 15

पारितोष ने टुक-टुक को धीरे से उठाया और अपने साथ चल दिया।
बिल्ली का छोटा सा शरीर उसके हाथों में हल्का था, लेकिन आँखों में थोड़ी बेचैनी और डर थी। टुक-टुक चुपचाप बैठा रहा, लेकिन उसके अंदर कुछ बेचैनी साफ़ दिख रही थी—जैसे उसे समझ आ गया हो कि कुछ गलत होने वाला है। कुछ देर बाद, पारितोष एक सुनसान रास्ते पर पहुँचा। और वहां… वही तांत्रिक खड़ा था।
जैसे ही उसने टुक-टुक देखा, उसका चेहरा खिल उठा।
उसकी आँखों में वो अजीब सा चमक थी, जो डर और लालच दोनों दिखा रही थी।

तांत्रिक ने धीमी, खौफनाक आवाज़ में कहा —
बिल्ला मिल गया,अब उस लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसा कर लाओ। फिर इनकी बलि देकर तुम और मैं… अमर हो जाएंगे।

पारितोष ने सिर हिलाया, और टुक-टुक को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया। बिल्ली ने हल्का म्याऊँ किया, और उसकी आंखें तांत्रिक की ओर झुक गईं। टुक-टुक के अंदर बेचैनी बढ़ रही थी, लेकिन कोई भी हिम्मत नहीं कर पा रहा था। वो जानता था कि अब ये सिर्फ़ उसकी बुद्धि और चालाकी पर निर्भर है—अगर शानवी को खतरा हुआ, तो सब खत्म हो सकता था। कमरे की खामोशी में तांत्रिक की हँसी गूँज रही थी, और टुक-टुक के दिल में सस्पेंस और डर का मिला-जुला एहसास फैल गया।

शानवी अब अपने काम में व्यस्त थी। लेकिन उसके आसपास कुछ अजीब सा था—कुछ ऐसा जो उसे बेचैन कर रहा था, और कभी-कभी उसके दिल में हल्की घबराहट पैदा कर रहा था।
वहीं पारितोष…अब ऑफिस में शानवी का नया colleague बन चुका था। हर बार, कोई बहाना ढूंढकर…कभी coffee break में, कभी photocopy machine के पास, वो उससे मिलता।

पारितोष (धीरे से, मुस्कुराते हुए) बोला - 
अरे शानवी… तुम्हारा weekend कैसे बीता?

शानवी (थोड़ी चौंककर) बोली - 
अच्छा… बस… काम में व्यस्त थी। और आप?

पारितोष (धीरे से, जैसे दोस्त बनकर) बोला - 
मैं भी busy था… लेकिन तुम्हें देखना अच्छा लगता है। वैसे… तुम्हारा pet अच्छा है।

टुक-टुक अब हमेशा साथ था। पारितोष ने उसे अपने plan में use किया। हर बार शानवी के पास टुक-टुक आने पर वो मुस्कुराता, उसे पास ले आता।

पारितोष (हाथ में टुक-टुक को हल्का उछालते हुए) बोला - 
देखो… ये बिलकुल तुम्हारी तरह प्यार करता है। तुम्हें miss करता है।

शानवी ने देखा…टुक-टुक उसके हाथों में कूदता, उसके पैरों के पास फुर्र-फुर्र करता। दिल में हल्की गर्माहट और nostalgia उठी।

शानवी (धीरे से, मुस्कुराते हुए लेकिन सावधानी से) बोली - 
हम्म… लगता है ये मुझे अभी भी याद करता है।

पारितोष धीरे-धीरे office में शानवी के पास पहुँचता रहा।
हर बार किसी ना किसी बहाने से।।कभी files share करने के बहाने, कभी project discussion के। और हमेशा—टुक-टुक का presence उसके plan का हिस्सा होता।

पारितोष (धीरे से, शानवी के कान में) बोला - 
तुम्हारा बिल्ली… हमेशा तुम्हारे पास रहना चाहता है… वैसे ही जैसे मैं…।

शानवी ने पीछे हटकर मुस्कुराया, पर दिल में हल्की डर और confusion थी।

टुक-टुक उसकी गोद में कूदा, और जैसे कह रहा हो—
तुम ठीक हो… पर सब गड़बड़ है।

पारितोष अब धीरे-धीरे…शानवी के trust को जीतने की कोशिश कर रहा था, टुक-टुक को अपने हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा
था। और असली मकसद अभी छुपा हुआ था। कमरे में…एक अजीब सी खामोशी और suspense फैली हुई थी, जहां सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन हर move carefully planned था।

कुछ दिन बीत गए। शानवी धीरे-धीरे पारितोष की मीठी-मीठी बातें सुनकर उस पर भरोसा करने लगी थी। हर छोटी मुस्कान, हर हल्की नजर… उसे थोड़ा गुमराह कर रही थी, लेकिन दिल में खुशी भी भर रही थी। एक दिन, ऑफिस की चाय ब्रेक के दौरान।

पारितोष ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —
तुम्हें पता है, जब मेरे बच्चे होंगे तो मैं उनका नाम क्या रखूंगा?

शानवी ने चौंककर पूछा —
क्या?

पारितोष की आवाज़ में एक अजीब गर्माहट थी वो बोला —
अगर लड़का हुआ तो मानव, और लड़की हुई तो मानवी। वैसे… मैं एक permission भी लेना चाहता हूं।

फिर रुककर बोला —
क्या तुम मेरे बच्चों की मां बनना पसंद करोगी?

शानवी शर्मा गई। शानवी के होंठों पर हल्की मुस्कान आई, और उसने धीरे से सहमति दे दी।

वो बोली - 
हाँ… मैं… जी बिल्कुल।

लेकिन टुक-टुक…वो शांत बिल्ली नहीं रही थी। उसके अंदर बेचैनी और डर उभर आया। पारितोष के मकसद को वह भली-भांति जानता था। उसके छोटे-छोटे पंजों ने फर्श पर हल्का फुर्र-फुर्र किया,

जैसे कह रहा हो—
ये गलत है… मैं इसे रोको नहीं तो सब खतरे में पड़ेंगे।
शानवी… ये तुम्हारे लिए सही नहीं है।

टुक-टुक की आँखों में चिंता और अंदर का इंसान जाग रहा था।
वो चाहता था कि शानवी समझ जाए…लेकिन अभी उसका कोई रास्ता नहीं था। कमरे की हवा में एक अजीब सा tension थी प्यार, धोखा और सच के बीच फंसा हुआ।

रात का अंधेरा कमरे में छाया हुआ था। शानवी गहरी नींद में थी, लेकिन अचानक कुछ हल्की आवाज़ें खिड़की की तरफ़ से आईं।
वो चौंककर उठी और बालकनी की तरफ बढ़ी। और वहीं…
खड़ा था कार्तिकेय, इंसान के रूप में।उसकी आँखों में गंभीरता और बेचैनी दोनों झलक रही थी।

शानवी (गुस्से में, हकलाते हुए) बोली - 
तुम यहाँ क्या कर रहे हो, कार्तिकेय?
जब मैंने कहा कि मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं, तो फिर क्यों मेरे पीछे पड़े हो?

कार्तिकेय ने धीरे से शानवी की तरफ देखा।

कार्तिकेय (धीरे, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
शानवी… मेरी तरफ देखो।
वो पारितोष सही लड़का नहीं है।
अगर तुम उसके झाँसे में आ गई, तो तुम बर्बाद हो जाओगी।

शानवी ने उसकी आँखों में झाँका और थोड़ा हँसते हुए कहा —
अब तुम मुझे बताओगे कौन सही है और कौन गलत?
तुम्हें तो शायद थोड़ी जलन भी हो रही है ना… क्योंकि मैं किसी और की बात सुन रही हूँ।

कार्तिकेय ने गहरी साँस ली।
उसका चेहरा आधा उदास और आधा गंभीर था।

कार्तिकेय (धीरे, लेकिन फटाफट) बोला - 
मैं जलन नहीं कर रहा, शानवी।
मैं डर रहा हूँ… तुम्हारे लिए।
तुम नहीं समझोगी, लेकिन पारितोष… उसके इरादे सिर्फ़ उसके लिए नहीं हैं।
वो तुम्हें फंसाना चाहता है… और मैं… मैं इसे रोकना चाहता हूँ।

शानवी थोड़ी देर चुप रही।

दिल में गुस्सा भी था और थोड़ी हिम्मत भी, कि उसने कहा—
तो ये तुम्हारा ही जलन का बहाना है?
मुझे डराने की कोशिश?
अगर सच में तुम इंसान हो… तो बताओ सब सच!

कार्तिकेय ने टुक-टुक की आंखें थोड़ी झुकी,

फिर धीरे से बोला—
शानवी… मैं तुम्हारे लिए सच बता रहा हूँ।
तुम्हारा जो भरोसा है, वही तुम्हें बचा सकता है।
पारितोष… उसके मकसद में तुम्हारे लिए खतरा है।
मैं तुम्हारे साथ हूँ… चाहे तुम मानो या ना मानो।

शानवी के दिल में अचानक हलचल हुई।
डर, गुस्सा, और थोड़ी हिम्मत—तीनों भाव एक साथ उमड़ आए।
वो महसूस कर रही थी कि अब… कहानी का सब सच सामने आने वाला है।