Shahad ki Gudiya - 59 in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (59)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (59)

            

                   शहद की गुड़िया - प्रकरण 59

         " दादू ने अपने बेटे की शादी तो करवा दी. उसे अच्छी समझदार बीवी मिली थी फिर भी ऊस के व्यवहार मे रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया था.. उन के लडके का नाम क्षितिज था. ऊस की आँखों का नूर चला जायेगा. यह सुनकर अपने सारे हथियार फेंक दिये थे. वह कुछ नहीं कर पायेगा. उसे कुछ नहीं करना हैं, यह सोचकर पर बैठे गया था. "

            " स्नेहा उसे संभालती थी, अपने पति का पूरा ख्याल रखती थी. गरिमा ने भी उसे काफ़ी मार्गदर्शन दिया था. लेकिन ऊस का कोई फायदा नहीं था. ऊस को क्रिकेट मे दिलचस्पी थी.. आंकड़ों का जूनून था.. वह हर किसी खिलाडी के आंकड़े को याद रखता था. उसे लिखने का शौक था. स्नेहा ने भी अपने पति को लिखने सहाय की थी लेकिन ऊस का कोई वेतन या पुरस्कार नहीं. प्राप्य था और ऊस ने लिखना बंद कर दिया था. "

              " अपने बेटे के भविष्य का ख्याल कर के दादू ने अपने बेटे को अंध संस्थान मे भर्ती किया था.. वहाँ वच्चो को प्रोत्साहित करने के लिये दिन की शुरुआत मे एक प्रार्थना गाई जाती थी. "

            " इतनी शक्ति हमें देना दाता   

             मन का विश्वास कमजोर होना,   

               हम चले नेक रास्ते पे,    

              भूलकर भी कोई भूल हो ना,

              " दादू ने अपने बेटे के बारे मे सारी बात बताई थी. वह रोज सबेरे अपने बेटे को संस्थान मे छोड़ने जाते थे. स्टेशन के ओवर हेड ब्रिज पर एक उन के लडके की उम्र की लड़की साथ जो जाती थी. वह क्षितिज का हाथ पकडकर ब्रिज चढ़ती थी. "

              " दादू उसे छोड़ने जाते थे ऊस पर संस्थान के आचार्य ने उन्हें रोकते हुए कहां था. "

              " लडके के साथ मत आओ उसे अकेला आने दो. "

              " उन का कहां मानकर दादू उसे सुबह मे स्टेशन तक जाकर अपाहिज लोगो के कक्ष मे चढ़ा देते थे और वह अकेला संस्थान तक पहुँच जाता था. दादू शाम को स्टेशन से उसे पिक अप करते थे. साथ मे अपने जैसे कई लडके होते थे तो उसे कोई समस्या नहीं थी.. "

              " ऊस की आँखे नहीं थी बाकी सभी अंग पूरी तरह सक्रिय थे. दादू ने अपने बेटे को समजाया था लेकिन ऊस को खुद पर भरोसा नहीं था. "

               " ऊस के सारे अंग सक्रिय थे लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था.. संस्थान मे वह सब से काबिल लड़का था. ऊस को थेरेपिस्ट बनने का मौका मिला था जो ऊस ने ठुकरा दिया था. "

               " संस्थान मे उसे बहुत कुछ चीजे बनाना सिखाया गया था लेकिन ऊस ने किसी चीज मे दिलचस्पी नहीं ली थी. ऊस को एक कंपनी अपनी शिक्षा के हिसाब से जोब भी प्राप्त हुआ था, वह भी ऊस ने ठुकरा दिया था. "

               " वह टी वी और अन्य माध्यमो के जरिये बहुत कुछ सिखने का दावा करता था लेकिन ऊस ने कुछ नहीं किया था. वह नकारात्मक सोच को गले लगाकर बैठा था. ऊसे हर चीज मे गलत दिखता था, गंदगी नजर आती थी. "

              " दादू ने उदाहरण देकर समजाया था..' हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बनते हैं. 'Our life is what our thoughts make it.'

                " दो लड़कों ने खिड़की से बाहर झांका एक ने कमल देखा और दूसरे ने कीचड. अब इस मे किसकी गलती. "

.                ऊस की याद शक्ति भी बडी तेज थी. वह सालो पुरानी छोटी मोती चीजों को बारीकी से याद रखता था. हर चीज का हिसाब रखता था. '

             " अपनी मा का तो मानो वह चौकीदार बन गया था. ऊस की हर चीजों पर दयान रखता था. वह पार्किंसन की रोगी थी. ठीक से बोलती, चलती, हीर फिर नहीं सकती थी. उसे कुछ याद नहीं रहता था. ऊस को इग्नोर कर के रुक्ष व्यवहार करता था, उसे गंदी गालिया देता था और मारता भी था. वह अपनी मा को रांड भी कहता था..

            " पिछली उम्र मे उसे स्टॉक मार्किट का चस्का लगा था. वह पूरा दिन उसी मे लगा रहता था. दादू के पैसों से वह यह काम करता था और ऊपर से पैसे खुद्द के होने का दावा करता था. दादू ने ऊस की वजह से 2,50,00/- का नुकसान किया था वह बात मानने को तैयार नहीं था और ऐसी दलील करता था. स्टॉक मार्किट मे कभी नुकसान भी होता हैं. "

               " ऊस का स्टॉक मार्किट का नशा शराब से भी बढ़कर था. "

               " वह सुबह 6-30 बजे से टी वी चालू कर के बैठे जाता था. मार्किट 9-15 को खुलता था और वह इतनी जल्दी टी वी चालू कर देता था."

               " हर चीज के भावो पर गौर करता था. नफा नुकसान देखता था. हर किसी की राय सुनता था. हर पल अपने पास के शैरों का अप डेट रखता था. हर पल अपने माता पिता को इन्वॉल्व करता था. "

              "दादू ने फिर भी हर संभावित प्रयास किये थे और अपने बेटे को मदद की थी. लेकिन उसे अपने पिता की कोई कद्र के फ़िक्र नहीं थी. वह अव्वल नंबर का मतलबी था. "

              " दादू को ऊस पर बड़ा गुस्सा आता था. ऊस की जुबान नोन स्टोप म्यूजिक सिस्टम जैसी थी जो कभी बंद नहीं होती थी. मा के साथ तो वह ऊँची आवाज मे बात करता था और ऊस के हर काम मे दोष निकालता था. विवाद करता रहता था.

              " देर हो जायेगी " यह ऊस का तकिया कलम हो गया था. वह अपनी मा को घड़ी घड़ी भाव के लिये तंग करता था, ऊस का टाइम बर्बाद करता था और हर काम मे देरी होने की शिकायत करता था. दादू की बीवी की दिमागी हालत बहुत ख़राब थी. उसे अपने अंध बेटे की परिस्थिति का लिहाज नहीं था. वह भी हर एक बात मे गलती ढूंढती फिरती थी."

               " इस वजह से घर की स्थिति बिल्कुल नाजुक हो जाती थी.

                       000000000000   ( क्रमशः)